सुमन सिंह याशी की ग़ज़लें | Suman Singh Yashi Poetry

ठोकर लाखों खाई  होगी

ठोकर लाखों खाई  होगी ।

तब आख़िर टकराई होगी।

ऐब गिनाने से पहले तुम

ढूंढों, कुछ अच्छाई होगी II

कितनी उम्मीदें आँखों में I

पलती ले अंगड़ाई  होगी II

जब आँखें ही मोल न समझे I

तब आवाज उठाई होगी II

यार खिलौना दिल मत समझो।

एक दिन सब भरपाई होगी।।

उसको जो बदनाम किया तो I

तेरी भी रुस्वाई होगी II

तोड़े होंगे वादे कितने

झूठी कसमें खाई होगी II

इन बहते आँखों के पीछे I

थोड़ी तो सच्चाई होगी II

क्यों करना फ़रियाद वहाँ, सब

बहरे,क्या सुनवाई होगी ।।

जो ख़रीदार नहीं है

दिल-ए-ख़ास कोई चीज़-ए-व्यापार नहीं है I
मिलता है उसी को जो ख़रीदार नहीं है II

वैसे तो ख़िलाफ़त से निखरती है मिरी राह I
इससे न समझ फूल से अब प्यार नहीं है II

जो कौल-ए-वफ़ा रोज दिखाता है सभी से I
मतलब कि किसी का भी वफ़ादार नहीं है II

अब नज़्र बदलता है अगर मौसमों के साथ I
तो मान किसी काम का किरदार नहीं हैं II

आब और हवा अब्र-ओ-ज़मी ख्वाहिश-ए-आलमI
खुसबू के लिए फूल गुनहग़ार नहीं है II

हर वक्त कहाँ दांव में अंजाम मुक़र्रर I
हारा है मगर अस्ल में वो हार नहीं है II

ये सोच ज़रा भार किया मैंने जमींदोज I
‘याशी’ ये मिरा ज़ीस्त अदाकार नहीं है II

शब्द
चीज़-ए-व्यापार= व्यापार की वस्तु
जमींदोज =जो चीज़ ज़मीन के बराबर कर दी गई हो, उतार देना
मुक़र्रर= तै किया हुआ, निश्चित
ख्वाहिश-ए-आलम =सबकी चाहत( संसार की चाहत )
कौल-ए-वफ़ा = वफ़ा/ निष्ठा का वादा

कभी बंजर नहीं करना

किसी भी हाल में अब कुर्बत-ए-बा-शर नही करना I
मुझे अब बाग़ को फिर से कभी बंजर नहीं करना II

चले आये टहलते ख़ैर तेरा पूछने को पर I
महज़ नादानियों से इश्क को कमतर नही करना II

इबादत की हमेशा पत्थरों को मान कर भगवान I
हकीकत जान दोबारा उसे पत्थर नहीं करना II

नही कोई शिकायत भी जमाने से जो है संगदिल I
वुजूद अपना मगर बेकार अब उसपर नही करना II

तमन्ना है न कोई हिर्स बस है आबरू प्यारी I
उसी पर वार हो ऐसा मुझे मंज़र नहीं करना II

अदावत की निगाहों से सलामत हो नहीं सकता I
मरासिम-ए-ख़ार चुभते को दम-ए-ख़ंजर नहीं करना II

ख़तम करके अदाकारी हक़ीक़त खोल दो ‘याशी’ I
न जाने क्यों तुन्हे ये फैसला खुल कर नहीं करना II

शब्द
कुर्बत.. नजदीकी
बा-शर= बुराई और ख़राबी के साथ
महज़ =सिर्फ़, मात्र
कमतर == निम्न स्तर का
संगदिल = कठोर दिल वाला
हिर्स = लोभ – लालच
दम-ए-ख़ंजर= ख़ंजर की धार
अदावत = दुश्मनी. प्रतिद्वंदिता

असर आज भी है

अगरचे तूफ़ानात घर आज भी है
दुआओं में उसके असर आज भी है II

शब-ए-चाँदनी ग़ैर हाज़िर तो क्या ग़म I
सितारों से जगमग सहर आज भी है II

गजब की कशिश है कि बिन गुफ़्तगू भी I
दिलों की समझ किस कदर आज भी है II

समझते समझते समझ आ गया है I
समझना किसी को सिफ़र आज भी है II

हो कितना भी मजबूत महल-ए-यकीं पर I
कहीं टूट जाए न, डर आज भी है

सुनो, पतझड़ों में गिरे सारे पत्ते I
हरा शाख़ से पर शज़र आज भी है II

दबाओ न इतना उछल दूर जाए I
कि स्प्रिंग में ऐसा हुनर आज भी है II

शब्द
अगरचे= के बावजूद
शब-ए-चाँदनी= चांदनी रात
सहर= सुबह
सिफ़र= शून्य , नामुमकिन( यहां )
शज़र= पेड़

रुक! अभी दास्तान बाकी है

रुक! अभी दास्तान बाकी है।
आखिरी इम्तिहान बाकी है।।

देख उठने नक़ाब है कितने।
बस ग़मों में उफ़ान बाकी है।।

हुस्न बदरंग हो गया तो क्या।
इश्क में अब भी जान बाकी है।।

आजमाए मेरे जुनू़ं को वो।
कातिलाना तूफ़ान बाकी है।।

चढ़ चुके दिन ग़ुरुर के बेहद।
देखना अब ढलान बाकी है।।

तीर से ज़ब्त मत टटोलो तुम।
मेरे सारे कमान बाकी हैं।।

आज ‘याशी’ ग़ुरुब से पहले।
फ़ैसला दरमियान बाकी है।।


शब्द
ज़ब्त.. बर्दास्त की क्षमता/ सहनशीलता, धैर्य
गुरूब..सूरज का अस्त होना/ खत्म होंना

नहीं बदलते हैं

चुभन से ख़ार से रस्ता नहीं बदलते है I
अज़ा इमान हमारा नहीं बदलते हैं II

किसी भी राह अगर चल पड़े तो चलते हैं I
तमाम रंज इरादा नहीं बदलते है II

शजर -ए प्यार ओ यकीं सूखता तो सींचेगे।
निग़ाह फ़ेर नज़ारा नहीं बदलते है II

किसी के वास्ते होंगे न मो’तबर वो जो I
हवा के साथ ठिकाना नहीं बदलते हैं II

हजार बात ज़माना अगर बनाये तो I
हुज़ूर रोज ज़माना नहीं बदलते हैं II

बदल गया जो बदलते दहर में, मत सोचो I
भुला दो, वक्त का सांचा नहीं बदलते हैं II

शरीक-ए राज बनाया किसे? नहीं सोचा !
महक से नाग ज़रा सा नहीं बदलते हैं II

शब्द
अज़ा – दर्द भरी बात, कष्ट, यातना
मो’तबर– सम्मनित, आदरणीय, सम्मान के क़ाबिल
रंज– तकलीफ़
ख़ुलूस – निष्ठावान , वफादारी
दहर – समय
शजर – पेड़

अच्छा नहीं होगा

चलोगे राह ऐसी तो सिला अच्छा नहीं होगा ।
नतीजन बाद में ख़ुद से गिला अच्छा नही होगा।।

रुकी राहें, सितम बेहद हुऐ तो दर्द का शोला।
बग़ावत का बनेगा ज़लज़ला अच्छा नही होगा ।।

दिखाई दे रहा जो दर्द-ओ-ग़म उसकी निगाहों में।
यकीनन उसका कोई फैसला अच्छा नहीं होगा।।

अजी जब याद करना, भूलना दोनों हुए मुश्किल ।
बनेगा हाल तब ये आबला, अच्छा नहीं होगा।।

सताओ, आजमाओ, रूठ जाओ,ठीक पर पैहम
फरेबी बेहिसी का सिलसिला अच्छा नहीं होगा।

न आओ पास भी इतने, ज़रा सा फर्क खल जाए।
बढ़े जो फिर मुसलसल फ़ासिला अच्छा नहीं होगा ।।

सिकंदर क्या बनेंगे जो न देखें मुश्किलें ‘याशी,
मगर दुश्वारियों का काफ़िला अच्छा नहीं होगा

सुमन सिंह ‘याशी’

वास्को डा गामा,  ( गोवा )

शब्द
बजा.. ठीक है
पैहम.. लगातार, बार बार
मुसलसल .. लगातार
फर्क.. अंतर, दूरी
आबला.. फोड़ा, छाला

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