माँ का कर्ज चुकाना है | Desh Bhakti Kavita

माँ का कर्ज चुकाना है

( Maa ka karz chukana hai )

 

सभी भारतीय आज एक हो जाना,
उग्रवाद हम को जड़ से ही मिटाना।
इन दुश्मनों को अब धूल है चटाना,
माँ वसुंधरा का कर्ज हमें है चुकाना।।

देश के वीरों ने अपने प्राण गवाएँ है,
आंधी तूफ़ान बारिश को भी सहे है।
इनकी शहादत को कोई ना भूलना,
जरुरत पड़े तो माँ का कर्ज चुकाना।।

सींचा है अपने खून से वीरों ने धरा,
लगाते है जो दिन और रात पहरा।
सेना से ही ये देश आज सुरक्षित है,
नाता भी इनका माँ और बेटे सा है।।

भाई- चारे का पाठ भी इनसे सीखों,
अपनी नज़रों से जरा इनको देखों।
धरा सुरक्षा के लिए घर छोड़ दिया,
माँ वसुंधरा को सबकुछ मान लिया।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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