देवों की साज़िश!

देवों की साज़िश | Kavita devon ki saazish

देवों की साज़िश!

( Devon ki saazish ) 

 

दिन रात हो रही है बारिश,
लगता है देवों ने रची है कोई साजिश!
गरीबों के मकान ढ़ह रहे हैं,
बारिश की पानी में बह रहे हैं।
कमाएं क्या?
खाएं क्या?
सब यही कह रहे हैं।
गांव से लेकर शहर तक हो चुके हैं जलमग्न,
ठप हो चुके हैं सारे आवागमन ।
पन्नी के नीचे गुजर कर रहे हैं,
हे इन्द्र देव रूक जाइए , सब कह रहे हैं।
हम गरीबों की क्या गलती है?
हर बार सजा हमें ही क्यों मिलती है?
रोजी रोटी पर भी है संकट,
घर परिवार की स्थिति है विकट;
झट स्वर्गलोक का ही कट जाता है टिकट!
बच्चे भी शुद्ध से पढ़ लिख नहीं पाते,
अल्पायु में ही वयस्क हो जाते।
बचपन की खुशियां मयस्सर नहीं होती,
जिम्मेदारी जो सर पे आ खड़ी हैं होती।
परिवार की दशा देख निकल पड़ते हैं कमाने,
जीवन की जद्दोजहद लगते हैं उन्हें सताने।
यही चक्र चलता रहता है,
पीढ़ी दर पीढ़ी भविष्य अंधकारमय ही रहता है।
क्या कभी सुधरेगी हमारी भी स्थिति?
या यूं ही झेलते रहेंगे विकट होती परिस्थिति।
देवता भगवान गाॅड ईश्वर अल्लाह बताइए ना!
क्या है हमारी गलती?
क्यों सुधर नहीं रही हमारी स्थिति?
क्या हमारे विलुप्त हो जाने पर ही मिलेगी आपको शांति?
या चाहते हैं आप कोई क्रांति!
यदि शांति मिले तो हमें मिटा ही दीजिए,
चैन से स्वर्गलोक में मजा लीजिए।
पर यूं तिल तिल कर न मारिए!
हम गरीबों पर भी कभी दया कीजिए?
बेमौत मरने से बचा लीजिए, बचा लीजिए,
चाहें तो इक्यावन का लड्डू ही चढ़वा लीजिए

नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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