आकर्षण है पाप में | Akarshan hai Pap Mein

आकर्षण है पाप में

( Akarshan hai pap mein )

 

जीवन की सुख-शान्ति,
दग्ध हो जाये न अनुताप में।
सदा सजग होकर रहना है,
आकर्षण है पाप में।

कुत्सित छलनायें आती हैं,
कृत्रिम रूप संवार कर।
सहज नहीं स्थिर रह पाना,
मन को उन्हें निहार कर।
एक-एक पग का महत्व है,
पथिक सशंकित रहना!
उस पथ पर, जो ले जाता हो
सदा पतन के द्वार पर।

सहज सौख्य जो प्राप्त भाग्य से,
मत बदलो अभिशाप में।
वंशीरव का भ्रम मत पालो,
दूर अरण्य विलाप में।

निर्धन को भी प्राप्त परम धन,
संयम से यदि श्लील रहे।
सतत कण्टकाकीर्ण पथों पर
चलकर सरल सुशील रहे।
सबकुछ होम न होने पाये,
अतृप्तियो की आग में।
मन-मयूर की तिर्यक गति हित,
बना विवेक-करील रहे।

आवश्यक है शुचिता मन की,
दैनिक कार्यकलाप में।
सदा सजग होकर रहना है,
आकर्षण है पाप में।

 

sushil bajpai

सुशील चन्द्र बाजपेयी

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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