हमने तो सारे दाँव जवानी पे रख दिये

हमने तो सारे दाँव जवानी पे रख दिये

राजा पे रख दिए न तो रानी पे रख दिये
हमने तो सारे दाँव जवानी पे रख दिये

सागर, शराब, जाम कसौटी पे रख दिये
उसने हिज़ाब जब मेरी मर्ज़ी पे रख दिये

मय-ख़्वार जब शराब से तौबा न कर सका
इल्ज़ाम मयकशी के उदासी पे रख दिये

सादा मिज़ाजी शहर में अब मिलती है कहाँ
जीने के क़ायदे ही अँगीठी पे रख दिये

बेशक लगा के हाथ में मेहँदी को आपने
तारे जहाँ के मेरी हथेली पर रख दिये

सारे गुनाह जो किये अहदे-वफ़ा के नाम
बच्चों ने वालिदैन की पगड़ी पे रख दिये

मीना कहाँ नसीब है मुफ़लिस को अब ख़ुदा
उसने तमाम सजदे ही रोटी पे रख दिये

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • इरादा डिगा नहीं सकता

    इरादा डिगा नहीं सकता हवा का ज़ोर इरादा डिगा नहीं सकताचराग़े-ज़ीस्त हूँ कोई बुझा नहीं सकताहुस्ने-मतला– किसी के सामने सर को झुका नहीं सकतावजूद अपना यक़ीनन मिटा नहीं सकता फ़कत तुम्हारी ही मूरत समाई है दिल मेंइसे मैं चीर के सीना दिखा नहीं सकता किसी के प्यार से जान-ओ-जिगर महकते हैंयक़ीन उसको ही लेकिन दिला…

  • उसका मज़ा ले

    उसका मज़ा ले गुलों सी ज़िन्दगी अपनी खिला लेजो हासिल हो रहा उसका मज़ा ले मुहब्बत हो गई है तुझको मुझसेनिगाहें लाख तू अपनी चुरा ले खरा उतरूंगा मैं हर बार यूँहींतू जितना चाहे मुझको आज़मा ले लुटा दूँगा मैं चाहत का समुंदरकिसी दिन चाय पर मुझको बुला ले घटा छाती नहीं उल्फ़त की हर…

  • बड़ा ही नेक | Bada hi Nek

    बड़ा ही नेक बड़ा ही नेक वो परिवार होगातभी अच्छा मिला संस्कार होगा कभी हमने न सोचा अपने घर मेंमुझे करना खड़ी दीवार होगा जमीं तो बाँट ली तुम सबने मेरीलवारिस अब हमारा प्यार होगा घरों की बात थी इतना न सोचायही कल भोर का अख़बार होगा अदब से बात जो करते हैं बच्चेउन्हीं का…

  • सुमन सिंह याशी की ग़ज़लें | Suman Singh Yashi Poetry

    ठोकर लाखों खाई  होगी ठोकर लाखों खाई  होगी । तब आख़िर टकराई होगी। ऐब गिनाने से पहले तुम ढूंढों, कुछ अच्छाई होगी II कितनी उम्मीदें आँखों में I पलती ले अंगड़ाई  होगी II जब आँखें ही मोल न समझे I तब आवाज उठाई होगी II यार खिलौना दिल मत समझो। एक दिन सब भरपाई होगी।।…

  • क्यों नहीं आते | Kyon Nahin Aate

    क्यों नहीं आते ( Kyon nahin aate )  वज़्न 1222 1222 1222 1222 अरकान -मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन बाहर का नाम – बहरे हजज़ मुसम्मन सालिम   ग़म-ए-दिल कैद से आज़ाद होकर क्यों नहीं आते रिहाई को खड़ी, खुशियां बुलाकर क्यों नहीं आते ॥ सही है, दोस्त होते सब, मगर जब कैफियत आड़ी घुमाते पीठ…

  • कितने | Kitne

    कितने ( Kitne )    पेड़ों से पत्ते बिछड़ गये कितने इस जग उपवन से उजड़ गये कितने सारा दिन अब ये चला रहे हैं फ़ोन इस युग के बच्चे बिगड़ गये कितने पहले हर कोई,गुनाहों से था दूर इस पथ को अब तो पकड़ गये कितने सबकी फ़रियादें,कहाँ सुनेगा रब इस दर पर माथा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *