एक बूढ़ा और बच्चा

एक बूढ़ा और बच्चा – “हाथों का सहारा”

भाग एक –

गांव के छोर पर स्थित एक पुराना घर, जहां बूढ़े दादा जी अपने प्यारे पोते के साथ रहते थे। उम्र के प्रभाव से दादा जी की याददाश्त कमजोर हो चुकी थी और शरीर भी थकान से झुकने लगा था। कभी खाना गिरा देते, तो कभी हाथ कांपते हुए पानी छलका देते। इन छोटे-छोटे कामों में वह अक्सर पोते का सहारा लेते, लेकिन वह मासूम पोता कभी नाराज नहीं होता, न ही शिकायत करता।

एक दिन गांव में एक बड़ी सभा का आयोजन हुआ, जिसमें हर घर के बुजुर्ग सदस्य को सम्मानित किया जाना था। दादा जी ने अपनी पुरानी चादर और छड़ी संभाली, और पोते से कहा,
“बेटा, मुझे वहां तक पहुंचाने में मदद कर दे।”
पोता खुशी-खुशी दादा का हाथ पकड़कर उन्हें सभा में ले गया।

सभा में जैसे ही दादा जी मंच पर पहुंचे, वहां मौजूद कुछ लोग आपस में फुसफुसाने लगे,
“इतनी उम्र हो गई है, अब इन्हें आराम करना चाहिए।”
यह सुनकर पोते की आंखों में गुस्से और गर्व का मिला-जुला भाव उभर आया। उसने तुरंत माइक थाम लिया और साहस भरी आवाज़ में कहा,

“आज जो मैं हूँ , वह इनके कारण हूँ । ये बूढ़े नहीं हैं, मेरे जीवन के पथ प्रदर्शक हैं। जब मैं छोटा था और चलना सीख रहा था, तब इन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था। आज जब ये थक गए हैं, तो मेरा दायित्व है कि मैं इनका हाथ थामूं। यह मेरा कर्तव्य भी है और मेरा स्वाभिमान भी।”

यह सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। वहां मौजूद लोग सोचने लगे कि वास्तव में बूढ़ा व्यक्ति और बच्चा एक-दूसरे के पूरक होते हैं—दोनों को सहारे की जरूरत होती है, और दोनों के पास एक-दूसरे को सिखाने तथा समझने की अद्भुत क्षमता होती है।

दादा जी की आंखों में गर्व और प्रसन्नता के आंसू थे, वहीं पोते का दिल अपने कर्तव्य का पालन करने के गर्व से भर चुका था। सभा में तालियों की गूंज उठी और लोग इस अनमोल सीख को अपने मन में संजोकर लौटे।

शिक्षा/ प्रेरणा :
बूढ़ों और बच्चों के बीच का रिश्ता हमें यह सिखाता है कि हर पीढ़ी का दायित्व है कि वह एक-दूसरे का सहारा बने। यह कर्तव्य जब सम्मान और स्वाभिमान के साथ निभाया जाए, तभी समाज की सच्ची उन्नति संभव है।

विशेष /नोट : यह कहानी, मेरी लिखी हुई हस्तलिखित कहानी है। वास्तव में, यह कहानी विशिष्ट व प्रेरक है।

श्रीमती बसन्ती ‘दीपशिखा’
प्रतिष्ठित लेखिका, सामाजिक चिंतक
अध्यापिका एवम् विभागाध्यक्ष
प्रेरक वक्ता, परामर्शदाता, शिक्षाविद्
हैदराबाद – वाराणसी, भारत।

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • प्रेम का प्यासा भेड़िया | Kahani Prem ka Pyasa Bhediya

    यह संसार प्रेम का भूखा है। दुनिया में दुख इसीलिए बढ़ गए हैं कि कोई किसी को सच्चा प्रेम नहीं करता। प्रेम के नाम पर बस वासना पूर्ति रह गई है। तोता, मैना, बंदर छोटे-छोटे सौम्य स्वभाव के जीव की कौन कहे प्रेम की प्यास तो भयंकर खूंखार जानवरों के हृदयों में भी पायी जाती…

  • रॉंग नंबर (PART-3 )

     रॉंग नंबर (PART-3 )    बम-बम भोले और हर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए हम मेला परिसर में दाखिल हुए। यहां लाई, खील बेचने वाले दुकानदार अपनी दुकानों के पीछे भोले भक्तों के ठहरने हेतु तिरपाल बिछा देते हैं। यह यहां का अघोषित नियम ही है कि जो जिस तिरपाल के नीचे ठहरेगा वह…

  • कपटी दुकानदार

    6 माह पुरानी बात है। स्कूल जाते समय मैंने एक किराना दुकानदार से 25 रुपए की नमकीन का एक पैकेट लिया और भुगतान करने को दुकानदार को 200 का नोट दिया। पेमेंट करके मैं दुकान से बाहर निकल गया। लगभग 3 किलोमीटर दूर जाने पर मुझे ध्यान आया कि दुकानदार ने मुझे 75 रुपये वापिस…

  • पहला प्यार | love story in Hindi

     पहला प्यार  FIRST LOVE (An one sided love story)                      PART-1 मैं कानपुर जाने के लिए तैयार हूँ। मैं वहां रहकर JEE एंट्रेंस की तैयारी कर रहा हूँ। इसका एग्जाम 21 मई को है।अभी मेरे पास 3 महीने हैं। मैंने अपने सबसे खास दोस्त सोनू से…

  • सुर असुर | Katha Sur Asur

    प्राचीन काल में सुर और असुर दो भाई थे । दोनों सहोदर थे।। जो भाई काम से जी चुराते थे। किसी प्रकार काम निकाल लेते थे । वह सभी सुर कहलाए। सुर वह लोग थे जो मुख्य रूप से सुरा और सुंदरी में हर समय मस्त रहकर अपनी शक्ति को क्षीण कर देते थे। सुरों…

  • स्वाभिमानी लड़का | लघु कथा

    अरूण स्वाभिमानी लड़का था। वह कक्षा‌ में सदैव प्रथम आता था। सब पूछते ” अरूण तुम घर में कितने घंटेपढ़ते हो आखिर रोज ?वह बोलता ” मुझे घर पर समय ही कहां मिलता है।दो गायें और एक भैंस है। उनको सानी पानी देना और फिर घूम घूम कर दूध बेचना आदि में व्यस्त हो जाता…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *