मां की आँखों के हम भी तारे हैं
मां की आँखों के हम भी तारे हैं
मां की आँखों के हम भी तारे हैं
मेरे जैसे ज़मीं पे सारे हैं।
इक नदी सी है ज़िन्दगी यारो
सुख के मिलतें नहीं किनारे हैं
देखता आजकल जिधर मुड़कर
हर तरफ़ ग़म के आज मारे हैं
हम ख़ुशी की तलाश में अब तक
ग़म के मारे थे ग़म के मारे हैं।
तुमको शृंगार की जरूरत क्या
दिल तो हम सादगी पे हारे हैं
क्या करें हम बखान तेरा अब
तेरे अंदाज ही तो न्यारे हैं
लौट आओ न भूलकर राहें
राह तेरी प्रखर बुहारे हैं

( बाराबंकी )
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