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मिलावट का धंधा देखो
यार कितना फल-फूल रहा है?
अपराधी भी सहज ढ़ंग से
अब समाज में घुल रहा है
थर-थर थर थर कांपे पड़ोसी
डर के मारे नहीं कोई कुछ बोल रहा है।
मिलावट का धंधा देखो
यार कितना फल-फूल रहा है?
नेता अफसर की बैठकी
दिन रात उनके यहां होती
आसपास की करते रहते दिन-रात ये रेकी?
देख भयभीत/ हतप्रभ हैं सब
अच्छे अच्छों की है बंद बोलती।
पिछले शिकायतकर्ता का परिणाम सबको है पता
सो मुंह नहीं कोई अब खोलता;
ऐसा करने/सोचने पर भी तन-मन है डोलता।
कहता हृदय ठहर जा,
क्यूं खतरा है मोल लेता?
जरा धीरज रख,
नमकीन मीठा कुछ चख।
ऐसे लोग होते अल्पायु,
चलेगा शीघ्र ईश्वर/समय का जादू!
मिलेगा छुटकारा इनके आतंक से,
मारे जाएंगे सारे ? कसम से।
इतिहास देखे हैं हमने,
यकीं ना हो तो तू भी एकाध पुस्तक पढ़ ले!
वक्त आएगा?
जब वो चीखेगा चिल्लाएगा।
मदद/रहम की भीख मांगेगा,
कसम से कोई मदद को नहीं आएगा।
उस दिन उसे अपनी औकात समझ आएगा,
पल में हवा हो जाएगा।
पीछे अपने काले कारनामे छोड़ जाएगा,
इतिहास स्वयं को दोहराएगा।
पहचान ( Pehchan ) भीड़ मे शामिल जरूर हों वह कार्य विशेष की एकता का प्रतीक है किंतु ,आप भीड़ का नही अपने उद्देश्य का हिस्सा बनें… ऊंचाई पताका उठाने से नही मिलती पताका योग्य होना ही आपको आत्मविश्वासी बनाता है और ,आज नही तो कल यही आज की भीड़ कल आपके हिस्से की भीड़…
काव्य कलश ( Kavya Kalash ) अनकहे अल्फाज मेरे कुछ बात कुछ जज्बात काव्य धारा बहे अविरल काव्य सरिता दिन रात काव्यांकुर नित नूतन सृजन कलमकार सब करते साहित्य रचना रचकर कवि काव्य कलश भरते कविता दर्पण में काव्य मधुरम साहित्य झलकता साहित्य सौरभ से कविता का शब्द शब्द महकता आखर आखर मोती बनकर…
प्रगति का रस्ता ( Pragati ka rasta ) मैं कभी नहीं मुड़ूंगा पीछे हमेशा चलता रहूंगा अपने पथ पर बिना किसी परवाह किए मैं अपने सभी गम को भुलाते हुए भूख प्यास को भुलाते हुए तन पर फटे कपड़े सजाते हुए आगे बढूंगा और मैं इस दुनिया में अपना नाम रोशन करूगा जब मैं…
ट्वीटर की धृष्टता ***** ट्वीटर वालों ने हमारे देश की आजादी, संप्रभुता, उदारता से खिलवाड़ किया है धृष्टता की है,मूर्खता की है इतना ही नहीं तकनीकी खामी बता- आरोपों से बचने की कोशिश की है। हमारी संप्रभुता से खिलवाड़ किया है, जम्मू एवं कश्मीर को- चीन में दिखाने का दुस्साहस किया है; लद्दाख को- जम्मू-कश्मीर…
लम्हे ( Lamhe ) एक लम्हे में ही कहानी बन जाती है एक लम्हे में ही जीवन बदल जाता है लम्हे के पल को समझना न कम कभी कभी लम्हे में ही जीती बाजी पलट जाती है लम्हे लम्हे ही सांसों का दौर चलता है लम्हे लम्हे ही गगन से बूंद बरसती है लम्हे…
अपनी छवि निहार ( Apni chabi nihar ) अपनी छवि निहार , सुध भूद खोई बैठी नयन राह देखे मेरे , सखियों से दूरी होई।। दिनभर चली पवन , पर कम न हुई तपन , पानी से भीगा तन, फिर भी प्यासा ये मन ।। अटखेलियां करती में, तुम बिन नीरस होई, फिर से…