आख़िर क्यों?

आख़िर क्यों?

क्यों हर राह तुझ तक जाती नहीं,
क्यों तेरी झलक नज़र आती नहीं?
हर रोज़ तुझे देखने की कोशिश की,
फिर भी क्यों मेरी दुआ असर लाती नहीं?

ना कोई शिकवा, ना कोई गिला है,
तेरे बिना हर लम्हा मुझे अधूरा मिला है।
मैंने तो बस तुझसे प्यार किया,
फिर क्यों मुझे ये फ़ासला मिला?

कभी ख्वाबों में, तो कभी यादों में,
तू ही बसी है मेरी हर फरियादों में।
फिर क्यों तुझे छू नहीं पाता मैं,
तेरा होकर भी, तुझको ही खो जाता मैं?

आख़िर ऐसा क्या गुनाह हो गया,
जो मेरा इश्क़ ही मेरे लिए सज़ा हो गया?

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

यह भी पढ़ें :

Similar Posts

  • ज्ञान का दीप जलाते शिक्षक | Shikshak ke Upar Kavita

    ज्ञान का दीप जलाते शिक्षक ( GYan ka deep jalate shikshak )    उनकी महिमा का वर्णन मैं कैसे करूं, ज्ञान की रोशनी जिनसे मुझको मिली, जब कभी लड़खड़ाएं है मेरे कदम, सीख से उनकी हिम्मत है मुझको मिली । अपने ज्ञान की पावन गंगा से, सबको शीतल कर देते शिक्षक। जीवन की अंधेरी राहों…

  • हरियाली जमीं | Hariyali Jameen

    हरियाली जमीं ( Hariyali Jameen )    कहीं हरियाली कहीं बंजर जमीं रहती है मेरे यार ज़ब बारिश अपनी बूँद जमीं रखती है है कौन खुशनुमा इस गर्दीशे जहाँ में जिसपर उसकी माँ की हरपल नजर रहती है कोई घर से दूर रहकर भी सुकूँ पाता है किसी को अपनों के सँग भी कमी रहती…

  • अधूरापन | Kavita Adhurapan

    अधूरापन ( Adhurapan )   कर लो कितनी है पूजा अर्चना नहा लो भले गंगाजल से सोच मगर मैली ही रही रहोगे दूर ही तुम कल के फल से से परिधान की चमक से व्यवहार में चमक आती नहीं कलुषित विचारों के साथ कभी बात सही समझ आती नहीं पढ़ना लिखना सब व्यर्थ है भर…

  • बोलना बेमानी हो जाए

    बोलना बेमानी हो जाए बोलो!कुछ तो बोलोबोलना बेमानी हो जाएइससे पहले लब खोलो पूछोअरे भई पूछोपूछने मे जाता ही क्या हैपूछना जवाब हो जाएइससे पहले पूछ लो चलोचाहे कितनी पीड़ा होचलना बस कदमताल न हो जाएवैसे भीचलना जीवन की निशानी हैरुकना मौत की लिखोचाहे कुछ भीकिसी के वास्तेचाहे कितना खराब हो मौसमलिखना बस नारा न…

  • उस दर पे कदम मत रखना

    उस दर पे कदम मत रखना जहाँ नहीं मिलता है प्यार तुम्हें। जहाँ नहीं मिलता सम्मान तुम्हें।। उस दर पे कदम मत रखना। उस घर में कदम मत रखना।। जो नहीं दे सकते तुमको खुशी। जज्बात तेरे जो समझे नहीं।। उस दर पे कदम———————।। तुझमें नहीं है कुछ भी कमी। क्यों उनकी गुलामी करता है।।…

  • उन्वान | Unwan

    उन्वान ( Unwan )    वो पन्ना किताब का सोचा था मुकम्मल हो गया चंद लफ्ज़ों की कमी थी उसकी बस तकमील को लम्हों की स्याही ऐसी कुछ बिखरी पन्ना नया अल्फाज़ वही मगर उन्वान ही बदल गया.. लेखिका :- Suneet Sood Grover अमृतसर ( पंजाब ) यह भी पढ़ें :- बिन तुम्हारे | Bin Tumhare

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *