अफसाने तेरे नाम के
अफसाने तेरे नाम के

अफसाने तेरे नाम के

 

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मेरी वफा का सिला यही वो मुझपे मरता है

 मिलता है जब भी जख्म हरा जरूर करताहै

जाने कहां से सीखा जीने का यह सलीका

कत्ल मेरा काँटे से नहीं वो फूल से करता है।

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वक्त को रखता हमेशा अपनी निगेहबानी में

वो जिनदगी को बडे गुरुर से जीता है

चढ गया रंग कुछ बहती हवा का उसपे भी

मुझे छोड हर शबनब हर हूर पे मरता है।

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मैने भी हटा लिए अपने कदम कुछ यूँ भी

आज अभी, इसी समय ,समझौता कोई नहीं

चाहत में होके बर्बाद वो आसमाॅ को

तकता है बेबुनियाद सवालात

नामालूम वक्त से,  क्या सोच के करता है।

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कभी जो हो मेहरबान किस्मत के सितारे

झोली में हीरे मोती वो गिन गिन के छुपाले

मुझको तलाशता है हर पत्थर हर बुत में वो

कभी वक्त था, कहा ,मुझे  दिल में बसाले

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रहे सलामत तू यादो औ किस्सो की पनाह में

उम्र गुजार डाली इन्ही उलझन उलाहनों में

यंकीन करने को कोई वजह थी भी कहाँ

तूने पल भी ना लगाया मेरा वुजूद मिटाने में

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अफसाने तेरे नाम के बहकने लगे हैं

गुलाब और कमल भी महकने लगे है

थे और बात है आँसू नहीं थमते हमसे

कश्ति इसी समन्दर में हमने खुदही डुबाई है।

 

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लेखिका : डॉ अलका अरोडा

प्रोफेसर – देहरादून

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