आज़ाद है
आज़ाद है
कहने अपनी बात को अब हर सुख़न आज़ाद है
बंदिशें कोई नहीं अब हर कहन आज़ाद है
हर गली हर शह्र और आज़ाद है ये हर पहर
साँस लेते चैन से हम ये पवन आज़ाद है
नफ़रतों के दायरों को तोड़ डालो मिल के सब
इल्तिजा बस अम्न की है, अब वतन आज़ाद है
टूटी ज़जीरें सभी अब तो सबेरा है नया
बहती कलकल है नदी और बाँकपन आज़ाद है
मौत आकर ले गयी तब चैन रुह को है मिला
ओढ़कर दो गज कफ़न मेरा बदन आज़ाद है
बेडियों में जकड़ी थी नारी हज़ारों साल से
हर सुमन अब तोड़ ज़जीर -ओ-रसन आज़ाद है
ये ज़मीं है मीर ग़ालिब और है रसखान की
आज तुलसी सूर का भी हर सपन आज़ाद है

कवियत्री: मीना भट्ट सिद्धार्थ
( जबलपुर )
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