Buddha

बुद्ध हो गयें । Buddh ho Gaye

बुद्ध हो गयें

( Buddh ho Gaye )

तन से
मन से
वचन से
कर्म से
मर्म से
धर्म से
जो शुद्ध हो गयें
बुद्ध हो गयें।

नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’
नरैना,रोकड़ी,खाईं,खाईं
यमुनापार,करछना, प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

माँ पर नरेन्द्र सोनकर की ४ कविताएँ

Similar Posts

  • मेरा और उसका गुमान

    मेरा और उसका गुमान   वो अपने को सरेख समझ,            मुझे पागल समझती रही, अब देख मेरी समझ,            उसके तजुर्बे बदल गए, अब मुझे ज्ञानी समझ ,         अपने को अज्ञानी समझ रही।   कुछ शब्द बोल माइक पर,        अपने को वक्ता समझती रही, अब  मंचों पर देख शब्दों का सिलसिला मेरा,…

  • युद्ध | Kavita youdh

    युद्ध ( Youdh )   देशों की लड़ाई भीषण चाहे युद्ध महाभारत होता समर भयंकर दुखदाई अनिष्ट अशुभ आर्त होता   हाहाकार मच जाता है मारकाट होती भारी नरसंहार निरंतर होता विनाश लीलायें सारी   राम रावण युद्ध हुआ तो लंका का विनाश हुआ कलिंग युद्ध में अगणित कितना नरसंहार हुआ   कौरवों की जिद…

  • रेशम की डोरी बहना का प्यार | Raksha bandhan par kavita

    रेशम की डोरी बहना का प्यार ( Resham ki dori behna ka pyar )     रेशम की डोरी राखी, भाई बहन का प्यार। त्यौहार सद्भावों भरा, राखी बंधवाइये।   कच्चे धागों में लिपटा, प्रेम सुधारस सार। रक्षासूत्र बांधकर, संबंध निभाइये।   अक्षत चंदन रोली, बहना लै बांधे राखी। रिश्तो की डोर को, पावन बनाइए।…

  • शराबी की दुनिया | Sharabi

    शराबी की दुनिया ( Sharabi ki duniya )    शराबी की दुनिया अब बोतल में बंद है। मधुशाला डेरा बना बस दारू आनंद है। नदी नाले कीचड़ में कचरे में वो जाता है। झूम झूम शराबी राहों में शोर मचाता है। जमीं बिकती ईमान बिके बीवी तज जाती है। भाई बंधु कुटुंब कबीला प्रीत कहां…

  • ढलने लगी धीरे-धीरे जवानी

    ढलने लगी धीरे-धीरे जवानी ढलने लगी धीरे-धीरे जवानीबदलने लगी धीरे-धीरे कहानीभरोसा दिलों का अब घटने लगापिघलने लगी धीरे-धीरे रवानी।। बुढ़ापा बदन पर छाने लगाचांद सा चेहरा मुरझाने लगाचेहरे पर दिखती नही कोई रौनकसचमुच बुढ़ापा अब आने लगा।। वो मौसम दिखे ना फिजाएं दिखेहरी भरी दिलकश हवाएं दिखेदिखता नहीं है जुनून दिल में कोईनजरों में अब…

  • चलो चलें | Chalo Chale

    चलो चलें ( Chalo Chale ) यह संसार तो दुःख का घर है।सपने में भी नहीं सुख यहाँ पर है। माया के हाथों में है सबकी डोर ।फिराए चाहे माया जिस भी ओर।लाचार जीव धुनें सिर पकड़ है।सपने में भी नहीं सुख यहाँ पर है। भटक-भटक कर थक जाएँ।सुकून कहीं पर न जीव पाएँ।भक्ति बिना…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *