कविताएँ

  • दरख़्त कुल्हाड़ी | Kavita

    दरख़्त कुल्हाड़ी ( Darakht kulhari )     बूढ़ा दरख़्त बोल पड़ा कुल्हाड़ी कहर बहुत ढहाती बिन लकड़ी के तू भी व्यर्थ चोट नहीं पहुंचा पाती   जिस लोहे की बनी हुई वह भी तो चोटे सहता है अपना ही जब चोट करें तो दर्द भयंकर रहता है   बिन हत्थे के तू कुल्हाड़ी चल…

  • राम विवाह | Ram vivah kavita

    राम विवाह ( Ram vivah : kavita )   टूट चुका धनुष शिव का तोड़े रामचंद्र अवतारी है सीताजी का हुआ स्वयंवर हर्षित दुनिया सारी है   देश देश से राजा आए दरबार भर गया सारा था धनुष उठा सके नहीं जो शिव शक्ति से भारी था   विश्वामित्र कहे राम से सब जनक राज…

  • कलम बोलती है | Kalam bolti hai kavita

    कलम बोलती है ( Kalam bolti hai )   कलम बोलती है कलम बोलती है पूरा तोलती है पूरा तोलती है   गूंज उठती है मंचों पर प्यारी सी रसधार बने गीत गजल छंद मधुर महकती बयार बने   बुलंद होती मुखर वाणी कुर्सियां डोलती है कलम बोलती है कलम बोलती है   कांपते हैं…

  • काले बादल | Kale badal kavita

    काले बादल ( Kale badal )   घिर आये सब बादल काले ठंडी ठंडी बूंदों वाले ताल तलैया सब भर जाओ मेघ तुम घटाओ वाले   चहक उठे चमन सारे प्रेम की बहती हो बहारें खेतों में हरियाली छाई खूब बरसो मेघा प्यारे   अधरों पर मुस्कान देकर बूंदों से तन मन भिगोकर मन मयूरा…

  • अभिलाषा | Abhilasha kavita

    “अभिलाषा” ( Abhilasha )   चाह बहुत  मनमंदिर मे भारत वीरो का गान करूं  उनकी त्याग तपस्या का सदा मान सम्मान करूं    श्रद्धा सुमन से ईश्वर की निसादिन करूं मैं पूजा  भक्ति भाव में जो सुख पाऊं और कहां है दूजा   दिल मे ईच्छा गुरु चरणों में बना रहे मेरा ध्यान शून्य ह्रदय…

  • दो जून की रोटी | Do joon ki roti kavita

    दो जून की रोटी ( Do joon ki roti )   दो जून की रोटी को खून पसीना बहा कर पाना चाहता सुकून दिन भर की थकान से   घर से निकलता मानव दो जून की रोटी को बेहाल हो गया मनुज हालातों के सामने   दो जून की रोटी की दिनोंदिन चिंता खा रही…

  • दहलीज | Dahleez kavita

    दहलीज ( Dahleez )   दहलीज वो सीमा रेखा मर्यादाएं जिंदा रहती है आन बान और शान की सदा कहानी कहती है   घर की दहलीज से बेटी जब ससुराल को जाती है आंगन की मीठी यादें रह रहकर याद सताती है   दहलीज समेटे रखती है आदर्शों को संस्कारों को रिश्तो की नाजुक डोर…

  • जमीं अपनी है | Poetry of Dr. Kaushal Kishore Srivastava

    जमीं अपनी है ( Zamee apni hai )   पार कर कांटो को कली फूल बनी है । तपिश मिट्टी की ही तो हीरे की कनी है ।।   राह में कांटे बिछे और दूर है मंजिल । राह और मंजिल में बेहद तना तनी है ।।   झुग्गियां  कीचड़ की तुमको खटकती क्यों हैं…

  • गुलशन | Gulshan geet

    गुलशन ( Gulshan )     गुल खिले गुलशन खिले खिलती चले बहार महकती फिजायें सारी चमन हुआ गुलज़ार   दिल की हसीं वादियो में फूलों का डेरा है खुशबूओं से भरा चमन है प्यार घनेरा है   बागों में बैठी कोयल तितलियां पंखों वाली गुलशन सारा महकता फलों से लदी डाली   पेड़ों पे…

  • शीशों के घर | Sheeshon ke Ghar Kavita

    शीशों के घर ( Sheeshon ke ghar )     शीशों के घर लड़ते हैं । पत्थर हम पर पड़ते हैं ।।   कहने के ही पत्थर हैं । शीशों से भी डरते हैं ।।   चाकू और सियासत को । हम भेड़ो से लगते हैं ।।   कच्चे शीशों की पत्थर । पहरेदारी करते…