देखो ! उसकी सादगी,
गीली मिट्टी से ईंट जो पाथ रही।
लिए दूधमुंहे को गोद में,
विचलित नहीं तनिक भी धूप में।
आंचल से ढंक बच्चे को बचा रही है,
रखी है चिपकाकर देह से-
ताकि लगे भूख प्यास तो सुकुन से पी सके!
खुद पाथे जा रही है।
दिनकर से न तनिक घबरा रही है,
न कोई छांव ही तलाश रही है।
पाषाण है तू क्या री?
बच्चे का इंतजाम कर संतुष्ट है बड़ी!
पाथे जा रही है,
बस पाथे ही जा रही है?
बचा खुद को भी!
अरी तू क्या कर रही है?
देखो आदित्य तेरे सिर मंडरा रहा है,
देख मेरा तो सिर चकरा रहा है।
घड़ी घड़ी ले रहा हूं आब की घूंट,
फिर भी गला जा रहा है पल में सूख।
तू किस चीज़ की बनी है,
लोहे की तो न लग रही है।
सजीव है,
हिल-डुल रही है;
मानो मुझसे कह रही है?
बाबू! मुझे जून की गर्मी नहीं-
दो जून की रोटी सताती है
इसलिए ये कड़ी धूप भी-
मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाती है।
गिनती करूंगी पूरी
तभी तो मिलेगी मज़दूरी?
वही बचाएगा,
रवि कुछ ना कर पाएगा;
मेरे जीजिविषा के आगे निस्तेज हो चित हो जाएगा।
भारत के त्यौहार ( Bharat ke tyohar ) मेरा भारत देश महान, जिसमे आते त्योहार तमाम । रौनक, खुशियाँ और धूम-धाम, उत्सव से सजी कितनी शाम। दीवाली में दीप हैं जलते, होली में रंग हैं उड़ते। ईद पर सब सिवइयां खाते, क्रिसमस पर हम पेड़ सजाते। हर त्यौहार में है कुछ ख़ास लाते…
ऐ जिंदगी ( Ai zindagi ) ऐ जिंदगी… कुछ देर ठहर जा बैठ जा कुछ कह जा कुछ सुन जा वक्त का तकाज़ा है कभी तू गुम है कभी मैं… हाँफती भागती सी तुझे छूने की होड़ में थकी मांदी सी सुस्ताने के बहाने ढूँढ तलाशती तुझको ही बोझिल कमज़ोर नज़रें मेरी ऐ…
स्मित स्मृतियों की मृदु मंथर वात ( Smit smrtiyon ki mrdu manthar waat ) स्मित स्मृतियों की मृदु मंथर वात हृदय उमड़ते भावों की नवप्रभात प्रिय मिलन की मधुर सी घड़ियां धड़कनों की डोरी सांसों की बात लबों के तराने दिलों का धड़कना लताओं की भांति हंसके लिपटना प्रित के सिंधु में हिलोरे हो…
हमेशा ही रहे हम तो बुरे उनकी निगाहों में ( Hamesha hi Rahe Ham To Bure Unke Nigahon Mein ) हमेशा ही रहे हम तो बुरे उनकी निगाहों में। गुनहगारों में की गिनती रहे जब बेगुनाहों में।। बिना सोचे बिना समझे कई इल्ज़ाम दे डाले। जिगर का दर्द पढ़ पाए नहीं वो…
मैं आपकी ( Main Aap ki ) जनम -जनम का प्रीति जुड़ा है । सर्वस्व आपसे पूरा है ।। धर्म, हे प्रभु! आप निभाइए। सुमा के भी नाथ कहाइए।। मांग सिंदुरी नित सजती रहे। पाँव पैंजनियाँ बजती रहे ।। कंगन भी मैं तो खनकाऊँ। नित मैं आपकी ही कहाऊँ।। भक्ति- धारा सदा बहाइए। सुमा के…