चूडियाँ

चूडियाँ | Kavita choodiyaan

 चूडियाँ 

( Choodiyaan )

 

सोलह श्रंगारों मे “चूडी” ||

1.चाँद सा गोल आकार, कुछ बड़ी कुछ छोटी सी |
रंगीन कुछ सतरंगी सी, कुछ पतली कुछ मोटी सी |
सोने पीतल और चाँदी की, कुन्दन काँच मोती की |
हांथो मे बजती खन-खन, कलाई सजाती गोरी की |

सोलह श्रंगारों मे “चूडी” ||

2.लाल हरी पीली काँच की, चूडी जब बनती है |
आग के बीच में तप कर, चूडी फिर सजती है |
लेकर आकार गोल, बाजारों मे आ बिकती है |
डलती है जब हांथो मे, कलाई खिल उठती है |

सोलह श्रंगारों मे “चूडी” ||

3.सोलह श्रंगारों का, चूडी अहम् हिस्सा है |
दुल्हन के सजने मे, चूडी का एक किस्सा है |
भर देतीं हांथों को, कलाईयाँ बज उठती हैं |
दूल्हे के दिल बीच, शहनाईंया बज उठती हैं |

सोलह श्रंगारों मे “चूडी” ||

4.चूडी की खन-खन से, घर मे एक हलचल है |
आया ये मेहमान कौन, मिलने की हर पहल है |
नजरें घुमा कर देखा जब, चूडियों की आहट है |
चूडी तो प्यारी चूडी है, खनक जाए तो चाहत है |

सोलह श्रंगारों मे “चूडी” ||

 

कवि :  सुदीश भारतवासी

 

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