कोविड अस्पतालों की सच्चाई !
कोविड अस्पतालों की सच्चाई !

कोविड अस्पतालों की सच्चाई !

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डेडिकेटेड कोविड अस्पताल!
का कुछ ऐसा है हाल?
न बेड है,
न डाॅक्टर रहे देख हैं!
कहीं पीपीई किट नहीं,
तो कहीं जरूरी उपकरण ही नहीं!
वेंटीलेटर की तो पूछो ही मत,
जिला में नहीं,मीडिया का है अभिमत।
वो बता रहे हैं,
दिखा रहे हैं।
जिला अस्पतालों में नहीं है वेंटिलेटर,
सरकार को लिखेंगे लेटर।
हम समझ रहे थे रोशनदान को वेंटिलेटर,
पता नहीं फिर कैसे लोग मर रहे हैं भीतर?
लिखा मीडिया को एक लेटर।
अस्पताल में तो दिखा मुझे कई वेंटिलेटर!
तुम बता रहे थे न्यूज में,नहीं है वेंटिलेटर,
मरीज दम तोड़ रहे बिना आॅक्सीमीटर।
मैंने देखा रोशनदान कई हैं,
कुछ पुरानी कुछ नई हैं।
फिर मीडिया वाले क्यूं चिल्ला रहे हो ?
नो वेंटिलेटर ! नो वेंटिलेटर!
सरकार को चूना तो नहीं लगा रहे हो ?
जवाब आया भैया!
रोशनदान और वेंटिलेटर में है फर्क,
अनर्गल न दीजिए तर्क !
वह प्राकृतिक रौशनी और हवा देती है,
यह कृत्रिम हवा देती है;
और जीवन की रौशनी बचाए रखती है।
अब समझा ?
प्राकृतिक और अप्राकृतिक का चक्कर!
एक मुफ्त होती है,
एक घंटे घंटे पैसे लेती है।
इसलिए यहां मरीज आते ही रेफर किए जाते हैं,
पटना जाते रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
अब समझा! वेंटिलेटर का खेल,
मैं तो रोशनदान समझ रहा था!
निकला पैसों का खेल ।
है बड़े बड़े लोग व माफियाओं का मेल,
मिल निकाल रहे जनता का तेल;
लगेगी हाय तुझे सरकार?
गरीबों की किस्मत से न खेल ।

 

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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