देख लो | Dekh Lo

देख लो

जश्न अपनी हार का इन महफ़िलों में देख लो
ज़ाम टकराते हुए इन अफ़सरों में देख लो

चीख कितना यह रहे अधिकार को तेरे लिए
अब ठहर कर आप इनकी नीतियों में देख लो

ये उपासक प्रेम के कितने बड़े है क्या कहूँ
आज इनपे आप उठती उँगलियों में देख लो

लूटकर ये अस्मते खूँ की मनाये होलियाँ
बेजुबाँ की बंद अब इन सिसकियों में देख लो

कौन तुमको था वहाँ सोचों हरा सकता भला
आ कभी तू बीच अपने दोस्तों में देख लो

प्यार के काबिल नही है वह सितमगर भी यहाँ
आप उनकी अब गली के आशिकों में देख लो

नाम तो बदनाम है बस अब तयायफ का प्रखर
बिक रही उनकी वफ़ा अब दौलतों में देख लो

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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