बज़्म को अब न आज़माओ तुम

बज़्म को अब न आज़माओ तुम

बज़्म को अब न आज़माओ तुम

बज़्म को अब न आज़माओ तुम
शेरों में कुछ नया सुनाओ तुम

बिन तेरे हम न जी सकेंगे अब
दूर नज़रों से यूँ न जाओ तुम

वो भी बेटी किसी के है घर की
अब न दुल्हन कोई जलाओ तुम

अम्न का दीप है जलाया जब
ये अदावत भी अब मिटाओ तुम

हो न तौहीन अब बुज़ुर्गों की
उनकी ख़िदमत में सर झुकाओ तुम

थम न जाएँ ये धड़कनें दिल की
बिजलियाँ दिल पे मत गिराओ तुम

कर लूँ दीदार मैं भी अब मीना
रुख़ से चिलमन ज़रा हटाओ तुम

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • पिंजरे का पंछी | Gazal Pinjre ka Panchhi

    पिंजरे का पंछी ( Pinjre ka panchhi )   हुस्न के ज़ेवर यूँ मत खोल कर दे मेरी दुनिया गोल पहले बाल-ओ- पर को तोल फिर पिंजरे का पंछी खोल फिर देगी गुफ़्तार मज़ा कुछ तो इस में शीरीं घोल मौसम करता सरगोशी क्या है इरादा कुछ तो बोल फिर होगी मदहोश ग़ज़ल जाम उठा…

  • हज़ल | Hazl

    इलेक्शन पास जबसे इलेक्शन है आने लगे तबसे नेताजी सर्कस दिखाने लगे ये है बापू का गुलशन यहां पर मगर डाकु, गुंडे हुकुमत चलाने लगे जबसे महंगी हुई है विदेशी शराब देसी दारू वो पीने पिलाने लगे मारना मच्छरों का जिन्हें पाप है रोज़ मुर्गा,मटन वो भी खाने लगे नौकरी रिटायर हम जो हुए घर…

  • मुझको दिखाता हर लम्हा गरूर है | Heart Touching Ghazal in Hindi

    मुझको दिखाता हर लम्हा गरूर है! ( Mujhko dikhata har lamha garoor hai )     मुझको दिखाता हर लम्हा गरूर है! हर व़क्त रखता वो चेहरा गरूर है   तुझसे  ख़ुदा ख़फ़ा होगा बहुत मगर करना  नहीं  मगर अच्छा गरूर है   यूं हाथ कल नहीं उससे मिलाया है हर बात में बहुत करता…

  • ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए

    ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए ।आपका बस हमें आसरा चाहिए ।। हार कर भी हमें सोचना चाहिए ।उसकी वाजिब सबब ढूँढ़ना चाहिए ।। जाँ रहा हूँ मिलूँगा तुझे भी सनम ।देखना पर तुम्हें रास्ता चाहिए ।। दो विदाई मुझे आज मुस्कान से ।फिर मिलूँ मैं तुम्हें तो दुआ…

  • चालाकियां चलता रहा

    चालाकियां चलता रहा ( ग़ज़ल : दो काफ़ियों में ) मुफ़लिसी से मेरी यूँ चालाकियाँ चलता रहाज़हनो-दिल में वो मेरे ख़ुद्दारियाँ भरता रहा मैं करम के वास्ते करता था जिससे मिन्नतेंवो मेरी तक़दीर में दुश्वारियाँ लिखता रहा मोतियों के शहर में था तो मेरा भी कारवाँफिर भला क्यों रेत से मैं सीपियाँ चुनता रहा कहने…

  • दुख ही दुख | Dukh Shayari Hindi

    दुख ही दुख ( Dukh hi dukh )   बोझ यहीं रहता है मन में दुख ही दुख झेले बचपन में याद बहुत आया आज मुझे खेला हूँ जिस घर आंगन में फ़ूल भरे दामन में कैसे वीरां है गुलशन गुलशन में और नहीं कोई भाता है तू रहती दिल की धड़कन में याद किसी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *