देश पाल सिंह राघव ‘वाचाल’ की कविताएं | Deshpal Singh Poetry
क्या हुआ
आजतक जो भी किए वादों का क्या हुआ
संग में चलने के इरादों का क्या हुआ
उठ गए उस शाम काँधे से झटक के सर
खट्टी-मीठी उन सभी यादों का क्या हुआ
जिनके बहकावे में आकर रूठ गए थे
आड़े-टेढ़े उन सभी प्यादों का क्या हुआ
अल्लाह के दरबार में मांगी थीं जो कभी
उन दुआओं और मुरादों का क्या हुआ
तुम अकेले और हम अबतक छड़े रहे
महफ़िलों में मिलीं उन दादों का क्या हुआ
उनके हलवा-खीर का
ये भला कैसा असर है इश्क़ की तासीर का
रंग ही बदला हुआ है हुस्न की तदबीर का
क्या कयामत है कि आरिज़ उनके नीले पड़ गए
हमने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का
उनकी पलकों से लरज़ कर अश्क ढलके गाल पर
काम किस कमबख़्त का ये किस दिले-बेपीर का
ये तड़प ये बेकरारी बेबसी ये सिसकियाँ
क्या किसी लैला ने तोड़ा दिल किसी की हीर का
जो करें दिन-रात मेहनत उनकी क़िस्मत भी अजीब
खा रहे बदमाश हिस्सा उनके हलवा-खीर का
देखा न कीजिए
चुनरी झटक सँभाल के देखा न कीजिए
हर तरफ़ देखभाल के देखा न कीजिए
दीवानावार दौड़ के कोई लिपट न जाए
आँखों में आँख डाल के देखा न कीजिए
शोख लबों की जुम्बिश हथेलियों पे रख कर
सरेराह यूँ उछाल के देखा न कीजिए
हमको नहीं गवारा गर आपके इशारे
गुस्से के सँग मलाल से देखा न कीजिए
ये दिलफरेब आदत हम जानते तुम्हारी
हमको ग़लत ख़याल से देखा न कीजिए
ले लेते हैं पंगे लोग
टुच्चे और लफंगे लोग
हैं कैसे बदरंगे लोग
सीधे सीधे खड़े दिखें
लेकिन हैं बेढ़ंगे लोग
भीतर-भीतर सड़े हुए
बाहर दिखते चंगे लोग
भरे पेट बिलबिला रहे
कितने भूखे-नंगे लोग
मल शोधित जल में नहा कर
बोलें हर हर गंगे लोग
बेमतलब बेवजह कभी
ले लेते हैं पंगे लोग
बैठ सुरक्षित महलों में
करवाते हैं दंगे लोग
रूठी हो तक़दीर
रूठी हो तक़दीर अगर हर दाव पड़े उल्टा-पुल्टा
साथ न दे तदबीर कभी तो चाव चढ़े उल्टा-पुल्टा
वक़्त हथौड़ा जब मारे नीलामी की नौबत आए
बिकती हो जागीर अगर तब भाव चढ़े उल्टा-पुल्टा
सही वक़्त पर दवा न की कल कर लेंगे कह छोड़ दिया
बन जाए नासूर वही तब घाव सड़े उल्टा-पुल्टा
छोटी-छोटी बातों पर जब अक्सर गाल फुला लेते
पक्का है इक रोज़ मियां अलगाव बढ़े उल्टा-पुल्टा
शायर तो हैं नामचीन पर मन की मौज अगर आए
लम्बा घूंट चढ़ा बैठे अश्आर गढ़े उल्टा-पुल्टा
चुप रहना ही समझ भरा
बढ़िया से बढ़िया लोगों की घटिया देखी चाल बहुत
अच्छे-अच्छे धुरंधरों की कर देखी पड़ताल बहुत
लेकिन जो हैं सीधे-सच्चे धर्म उन्हीं से टिका हुआ
धर्म के ठेकेदार बजाते घूम-घूम खरताल बहुत
समय समय पर सबक सिखाता समय बड़ा बलवान सुनो
सही समय जो नहीं सीखते वे होते बेहाल बहुत
उसकी फितरत कुछ ऐसी थी सबसे हँस कर मिलता था
इक दिन जेब टटोली उसकी गीला मिला रुमाल बहुत
बड़बोलों के दरबारों में चुप रहना ही समझ भरा
जैसे मैं हूँ मितभाषी पर लोग कहें ‘वाचाल’ बहुत
अब वो हूक कहाँ
जब विकास के पहिए घूमे हमसे हो गई चूक कहाँ
कंक्रीट के जंगलात में खेत खो गए रूख़ कहाँ
तोते बुलबुल मैना पण्ड़ुक चहका करते थे छत पर
मोरों के वो गीत कहाँ हैं कोयल की है कूक कहाँ
चापलूस चंगेज़ हो गया रही साँच की पूँछ न मूँछ
तानाशाहों के मुँह पर कहने वाले दो टूक कहाँ
छोटे-छोटे लालच और धन संचय में ही लिप्त रहे
देश-धर्म पर मिटने वाली लुप्त हो गई भूख कहाँ
भाई अत्याचार सह रहा भाई खड़ा-खड़ा देखे
देख किसी पर ज़ुल्म उठा करती थी अब वो हूक कहाँ
ले ही लेते पंगे लोग
लुच्चे और लफंगे लोग
हैं कैसे बदरंगे लोग
सीधे-सीधे खड़े दिखें
लेकिन हैं बेढ़ंगे लोग
भरे पेट बिलबिला रहे
कितने भूखे-नंगे लोग
बैठ सुरक्षित महलों में
करवाते हैं दंगे लोग
बेमतलब बेवजह कभी
ले ही लेते पंगे लोग
कभी अमल में लाते हो क्या
घर में करते दीया बाती दिल में ज्योत जलाते हो क्या
घर-आँगन सी मन मंदिर में झाड़ू नित्य लगाते हो क्या
धूप-दीप नैवेद्य उठा मंदिर-मजार तो जाते हो
बैठ शांत कुछ समय कभी ईश्वर का ध्यान लगाते हो क्या
कुत्ते को तो सैर कराने लेकर जाते साँझ-सवेरे
मात-पिता के संग बैठकर दुःख-सुख की बतियाते हो क्या
अपनों को ख़ुशहाल देख कर मन में फूले नहीं समाते
देख तरक्की गैरों की भी इतना ही हर्षाते हो क्या
पर उपदेश कुशल बहुतेरे बनकर फिरते ऐंठे-ऐंठे
अपनी बातों को बतलाओ कभी अमल में लाते हो क्या
हरियाणवी गीत
बेसक कर कै देख लियो साझे का मारै काम घणा
दोस जेठ नै दिया करैं भादों का मारै घाम घणा
नंगे पाँव गल़ी में हांड़ै साहूकार बदनाम घणा
धन दौलत की कमी नहीं चमड़ी तै प्यारा दाम घणा
असली मुजरिम कदे न पकड़ै थानेदार का नाम घणा
पीसे ले कै छोड्डै मुन्सी बेइमान का जाम घणा
लेने लेने की धुन लागी देने का ले नाम नहीं
कदे किसे के चिरे न मूतै नेताजी सरनाम घणा
बाढ़ काल़ ओल़े मारैं किरसक पिटता बेदाम घणा
धन आल़े के साथ खड़्या निर्धन नै मारै राम घणा
रणचण्डी
नखशिख वर्णन की लय पर
मत करो व्याख्या
इसके उर अरु उरोजों की
वासकसज्जा अभिसारिका नहीं क्राँति
बन्धू, ये रणचण्डी है
कि जिसके आते छँट जाती है सारी काई
रूमानियत के उथले जल की
आया कीजिये
मुक्तक
मुस्कुराते फूल सा खिलने भी आया कीजिये
घाव औरों का कभी सिलने भी आया कीजिये
एक दिन भगवान ने इक बडा सा ताना दिया
मांगने आते हो बस मिलने भी आया कीजिये
सोने का पानी चढवाकर पीतल चिडा रहा गहनों को
अब्दुल्ला का टेढा आँगन ठेंगा दिखा रहा सहनों को
उल्टा बाँस बरेली आए सही कहावत सिद्ध हुई
रानू मण्डल राग सिखाए आशा और लता बहनों को
कुतर-कुतर कर खा ले
बेबस और लाचार करे क्या ख़ूब क़हर बरपा ले
लावारिस की लाश लहर तू चाहे जिधर बहा ले
ना जाने इस सहर की कब कहाँ शाम हो जाए
जी भर के इस रात गले ऐ जाने-जिगर लगा ले
हर मौसम यकसा नहीं होता ना ही हर इंसान
जैसे नहीं एक से होते शामो-सहर उजाले
रहे कमाते उम्र बीत गई ना बच्चों का रखा ख़याल
भटक गए बेटे-बेटी अब परेशान घर वाले
पालीं क्यों उम्मीदें इतनी पाले क्यों अरमान मियां
छोटी रह गई खाट पैर अब इधर-उधर सरका ले
मग़रिब में जाने को कह कर जब मशरिक़ को भाग गया
बोए पेड़ बबूल कहाँ से आम तोड़ कर खा ले
रिश्ते-नातों के दरिया में गोते ख़ूब लगाए तूने
वक़्त आखिरी वृद्धाश्रम में बाक़ी उम्र बिता ले
इधर-उधर से उठा के पैसा कर्ज़ का बोझा बढ़ा लिया
कैसी आफ़त खरीद लाया घर में बैठा ठाले
नौंचा जिनसे औरों को बेहाल बड़ा ‘वाचाल’ किया
अब अपने उन नाख़ूनों को कुतर-कुतर कर खा ले
पानी जो ठहरा-ठहरा है
नाकाम रहा बेशक़ फ़िर भी आँखों में रंग सुनहरा है
चाहत उड़ने की थी लेकिन दिल पर पाबंदी-पहरा है
उनके सारे अहसानों को न भूला हूँ न भूलूंगा
बरसों पहले जो झेला था वह घाव अभी भी गहरा है
बस चुपचाप सहा जाए सब देख रहा ऊपर वाला
तो उससे शिकवा क्या कीजे क्या रब्बा अंधा-बहरा है
कोई तो बात रही होगी कुछ चूक हुई होगी मुझसे
झण्डा ख़ाना बरबादी का जो मेरे सर ही फहरा है
बेवक़्त तबाही लाएगा क्या इतना भी मालूम नहीं
इस गहरे शांत समंदर का पानी जो ठहरा-ठहरा है
मैं मदिरा पीना भूल गया
१/४ भाग
मित्रो, तुमसे क्या शरमाना
मैं मदिरा का हूँ दीवाना
मैं दास, स्वामिनी हाला है
संसार मेरा ये प्याला है
पीने के खातिर ही तो मैं
आता हूँ नित्य पहाड़ी पर
मधु का मैं दक्ष खिलाड़ी, पर
क्यों नियम आज प्रतिकूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
जी, पीता हूँ लेकिन शराब
अब जो चाहे कहिए जनाब
नहीं लहू किसी का पीता हूँ
मदिरा पी कर तो जीता हूँ
कृपया क्षमा करें श्रीमन्
इस क्यों का कोई जवाब नहीं
कहने की मुझमें ताब नहीं
कि झुक मय का मस्तूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
भटभटी उठी थी पीने की
तो आग बुझाने सीने की
नित की भाँति घर से निकला
बोतल आँटी में दे निकला
किन्तु निष्ठुर प्रकृति को
मेरा ये पीना ना भाया
छल से मुझको यूँ भरमाया
कि छूट मेरा मक़बूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
क्रमशः
२/४
झरझर झरना झरता जाता
कलकल कलकल करता जाता
कहीं दूर पपीहा बोल रहा
साँसों में स्वर को घोल रहा
वन जीवन के मिश्रित स्वर ने
आकृष्ट किया यों मौक़े पर
शीतल समीर के झौंके पर
उन्मत्त हृदय यूँ झूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
थे रंग-बिरंगे फूल खिले
लाल श्वेत नीले पीले
कुदरत की चादर पर हर सू
मनमोहक फैली थी ख़ुशबू
इस नैसर्गिक सौंदर्य की
अज्ञात पिपासा जाग उठी
सोई अभिलाषा जाग उठी
बन मैं भी क्यों नहीं फूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
कहीं हिरण चौकड़ी मार रहे
खेतों में मोर पुकार रहे
कूहूकू कोयल गाती थी
टीहूटी टेर लगाती थी
कहीं दूर टिटिहरी बंजर में
रम्भाते बछड़ों का निनाद
हर लेता था मन का विषाद
संताप ज्यों उखड़ समूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
क्रमशः
३/४
नलकूप का मंजर प्यारा था
चल रहा इक बड़ा फुहारा सा
उप रजबाहा सी थी नाली
खेतों में छाई हरियाली
कृषि अनुसंधानों से लाकर
बोईं जो भिन्न-भिन्न नस्लें
तब देखने हरी-भरी फसलें
लठिया ले वृद्ध रणधूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
क्यारी में युवती खड़ी एक
पानी की गतिविधि रही देख
रह गया हृदय को थाम खड़ा
जा दूर हाथ से जाम पड़ा
अवलोकन में यूँ लीन हुआ
हृदय पट पर खिंच गई रेख
उस युवती का रंग-रूप देख
नीयत का बदल उसूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
पनघट की छवि न्यारी देखी
यौवन की फुलवारी देखी
सिर घड़ा घड़े पर मटकी थी
रस्सी कंधे पर लटकी थी
वर्णन अब मैं किस भाँति करूँ
तन रचना अति सुडौल देख
शिशु अंक हाथ में डोल देख
सीना विस्मय से फूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
चिन्ता रत सी इक नार, लिए
बच्चे को गोद में प्यार किए
थी झूम रही, हृदय घन में
पति प्रीत छुपाए तन मन में
तुम ना आए युग बीत गया
प्रतीक्षा की घड़ियाँ गिनते
इन साँसों की कड़ियाँ गिनते
यौवन-जीवन हो स्थूल गया
मैं मदिरा पीना भूल गया
४/४ अन्तिम भाग
कृषक बालाएँ आठ-सात
रँग गोरा-श्यामल सुघड़ गात
गाती घर वापस आती थीं
कुछ हँसती कुछ इठलाती थीं
हरि हर के देस हरियाणे में
पाछे तै इक रैहड़ू आया
रेत्ते का जो बादल़ ठाया
तन सबका हो धूल़मधूल़ गया
मैं दारू पीणी भूल गया
मैं आऊँ– ना ना अभी नहीं
दोड़ो छुप जाओ सभी कहीं
बालक ही रहने में सुख है
ना चिन्ता कोई ना दुःख है
मुझको फ़िर बाल बना भगवन्
विनती है, जाम पिला दूंगा
अच्छा कोई काम दिला दूंगा
ये क्या बक ऊल-जलूल गया
मैं दारू पीणी भूल गया
घर में घुसते ही झपट पड़ी
घरआल़ी, दौड़ी रपट पड़ी
नाल़ी में कीचड़ ज़्यादा था
मेरे हक़ से यो फायदा था
ना तै झाड़ू की सींक-सींक
मेरे बाल़ां में घुस जाती
या मेरी डाढ़ी खुस जाती
पै उंह का क्रोध फिजूल गया
मैं दारू पीणी भूल गया
असहाय दुखी बेबस नारी
रो कै न्यूँ बोल्ली बेचारी
घर म्हं मुट्ठी भर चून नहीं
तू पी क्यूँ लेता ख़ून नहीं
बैरण शराब की जगह मेरा
तेरी दारू की संगी में
भोजन-लत्ते की तंगी में
बच्चों का छूट सकूल गया
मैं दारू पीणी भूल गया
बरसात में बादल
कस्तूरी मृग से भागते-दौड़ते
झाड़ी-झाड़ी सूंघते-चाटते
यहाँ-वहाँ उछलते-कूदते
हो जाएँ अदृश्य
और सुदूर विस्तृत वन के किसी कोने से
फ़िर प्रकट हो जाएँ
रूपसी की स्याह घनी जुल्फ़ों से घिरे रुखसार पर
फैल जाए हसीन तबस्सुम
तब उसे अपलक देख रही आँखें
हो जाएँ चकाचौंध
गैस के मरीज़ से
गरज पड़ें
खाट पर सोए भीत से शिशु का
ज्यों निकल जाए पेशाब
बरस पड़ें
रुक-रुक के थम-थम के
खबरदार
रिदा पसारे घूम रहे हो, खबरदार
बिना सहारे घूम रहे हो, खबरदार
साँसों का क्या पता कहाँ कब धोखा दें
लिए उधारे घूम रहे हो, खबरदार
आएगा सैलाब तुम्हें मालूम मगर
नदी किनारे घूम रहे हो, खबरदार
कट के जड़ से रूह रसाई को भटके
बन मतवारे घूम रहे हो, खबरदार
मृत्यु जाल बुनता रहता हूँ
पुष्पों की है अभिलाषा
भीतर कांटे चुनता रहता हूँ
मैं पल-पल घुनता रहता हूँ
कैसा मूरख भरमाया मैं
जाने कहाँ चला आया मैं
धूप यहाँ झुलसे देती है
अगणित पेड़ों की छाया में
भट्टी के तपते बालू में
मक्की सा भुनता रहता हूँ
पर्वत भूल रहे अपना कद
गीदड़ बना रहे हैं सरहद
कांटेदार झाड़ियों से क्यों
साया मांग रहा है बरगद
भारत की इस नियति पर मैं
सिर अपना धुनता रहता हूँ
फूल नहीं हूँ खार लिए
दिल में तपता प्यार लिए
काया की सुन्दर नौका
यौवन की पतवार लिए
साँसों के तारों से अपना
मृत्यु जाल बुनता रहता हूँ
थोड़ा और पिला दे साक़ी
अभी-अभी तो आकर बैठे, सारी रात गुज़रना बाक़ी
इतनी जल्दी क्या है तुझको, थोड़ा और ठहर ना साक़ी
तन के तीर तैरने वाले, अधिकांश अनुरागी देखे
मन के घाट नहाने वाले, थोड़े से बडभागी देखे
कहने करने में है अन्तर, कौन समझ पाया है उनको
उजले-उजले कपड़ों वाले, भीतर-भीतर दाग़ी देखे
अन्तर्मन के भाव समझने, गहरी झील उतरना बाकी
बहुत बड़ी भागीदारी की, ख़ुद अपनी बरबादी में
सारी उम्र नाचते बीती, बेगानों की शादी में
अपने खातिर वक़्त मिला कब, कब ख़ुद के बारे में सोचा
मरते खपते रहे सदा ही, उनकी ख़ानाआबादी में
जब चेते तो देर हो गई, अब नाख़ून कुतरना बाक़ी
ठोकर खाकर भी ना सम्हले, तो फ़िर पछताए क्या होना
अरसा गुज़र गया हो जिनको, बीती बातों को क्या रोना
आज अभी की बात चलाओ, बीता उस पर माटी डालो
आओ मिलकर दोनों देखें, मुस्तकबिल का सपन सलोना
अपनों ने जो दिए निरन्तर, उन ज़ख़्मों को भरना बाक़ी
किस-किस का विश्वास
कुछ अक्षर भेजे थे दिल्ली कि मंत्र बन कर लौटेंगे
कुछ गाली बन कर लौटे, कुछ षड़यंत्र बन कर लौटेंगे
जिनको चाहत वोटों की थी, जो पैरों पर भी झुकते थे
ऐसा तो कभी सोचा भी न था, घनतंत्र बन कर लौटेंगे
सीधे-सच्चे-ईमानदार, जन-जन का मन हरने वाले
छल, कपट और घोटालों का, संयंत्र बन कर लौटेंगे
भेजा तो था स्वतंत्र उन्हें, लेकिन निज हित के लालच में
कुछ तलवे चाट के लौटे, कुछ परतंत्र बन कर लौटेंगे
दग़ाबाज़, मक्कार, फरेबी, झूठे और पाखण्ड़ी सब
राजनीति के जंगल में, स्वतंत्र बन कर लौटेंगे
अमीर हैं
पुलिया की पूर्वी दीवार पर
ख़यालों की ऊँची मीनार पर
पश्चिम की ओर मुँह किए बैठा था
विचारों की गति ऐसी द्रुत
कि क्रम देना कठिन
गड़्मगड़्ड़
इक दूजे से घुल्लमघुल्ल
मैं उदास
मन बेचैन
तभी
दूर कहीं तीतर पुकार उठा —
अमीर हैं, अमीर हैं
सम्पादक की सलाह
नित नए-नए चेहरे आते हैं
साथ में लाते हैं —
कविता, कहानी, लेख
और न जाने क्या-क्या
कहते हैं — सिर्फ़ एक चांस, एक ट्राई
फ़िर तो जमा दूंगा रंग
कस-कस कर व्यंग्य
ज़माने पे
नौकरी पे, छोकरी पे, सरकारी खजाने पे
वंस, प्लीज़ पढ़िए तो
मैं अनमना सा पढ़ता हूँ
रचनाएँ स्तरीय होती हैं
किन्तु अन्दर ही अन्दर सड़ता हूँ
फिर सखेद कहता हूँ
भई, ये विषय तो है पुराना
कुछ और लिखो न
समथिंग न्यू, अपीलिंग
वे ‘कुछ और’ निकालने में हो जाते हैं व्यस्त
मैं होकर कुपित, फुलाकर गाल मन ही मन कहता हूँ–
कम्बख़त कर रहा है समय खराब
क्यों न दे दूँ जवाब
और कहता हूँ:
अरे, वह भी इसी की तरह होगा पुराना
यूँ तो तुम बीच ही में लटकोगे
साहित्याकाश में भटकोगे
चमकने के चक्कर में
पर जमे हुए लेखकों की रचनाओं की टक्कर में
ये बढ़ाएंगी शोभा रद्दी की टोकरी की
इसलिए
बेहतर है बन्धू!
छोड़ो ये लेखन धन्धा
और करो तलाश किसी नौकरी की
अदा से मुस्कुराना
मुझे लुभाए उसका अंदाज़ कातिलाना
सब कहते हैं उसको शिकारी है पुराना
छत पर आई ली अँगड़ाई
देखा मुझको तो शरमाई
दोनों हाथ उठाकर उसने
जो अपनी बन्दूक चलाई
चूका कैसे उसकी नज़र का निशाना
छक्के रोज़ छुड़ाने वाली
सबके होश उड़ाने वाली
जब मेरे सम्मुख आए तो
हँसकर नज़र झुकाने वाली
मन को भा जाता है अदा से मुस्कुराना
अधूरापन
वर्षों का विश्वास तोड़ कर, चलता बना जम्बूरा मन।
अब तक मुझे कचोट रहा है, मेरा यही अधूरापन।
धड़कन तार-तार हो जाती, सपना दिन में तारे सा।
साँस गुटरगूँ करता रहता, अपना बिना सहारे सा।
बनी ज़िन्दगी ढोल-नगाड़ा, बाजे ख़ूब तँबूरा मन।
आओ और उड़ाओ खिल्ली, मेरे एकाकी पन की।
चिन्दी-चिन्दी छीन-झपट लो, बेढ़ंगे जर्जर तन की।
ओखलिया में कूट-कूट कर, बना लिया है चूरा मन।
जाने कैसी विह्वलता है, क्यों बेचैन सदा रहता।
शंका-आशंका में डूबा, चुप रहता फ़िर कुछ कहता।
ऊपर-ऊपर से रसगुल्ला, भीतर बड़ा धतूरा मन।
जितना इसकी झोली में है
उथल-पुथल तो चलती रहती राजनीति के जंगल में
कौन पटखनी किसको देगा अप्रत्याशित दंगल में
भारत की ही बात नहीं पूरी दुनिया ही उलझी है
उठा-पटक में दाँव-पेच में मंगल और अमंगल में
कैसे-कैसे ख्यात और कुख्यात यहाँ नेता उभरे
सब कुछ सम्भव है लेकिन मोदी होना आसान कहाँ
किस पल दाँव कौनसा चलना कब गोटी क्या फिट करनी
अनुचित और उचित दोनों में कथा कौन-सी हिट करनी
आगे बढ़े देश जिससे केवल उस की ही बातें हों
बिन सोचे समझे रणनीति नहीं कोई परमिट करनी
ढूंढ़-ढूंढ़ कर हीरे लाया राख कोयले दूर किए
जितना इसकी झोली में है सब की में सामान कहाँ
सुरक्षा छ्न्द
अपना भेद बताने वाले
दुश्मन गले लगाने वाले
सिर धुन-धुन कर पछताएंगे
भानुमति के कुनबे जैसे
दुष्परिणाम लिया मत कीजे
ऐसे जाम पिया मत कीजे
घर बरबाद कराने वाले
नानी याद दिलाने वाले
गली-गली में मिल जाएंगे
उनके उकसावे में आकर
कोई काम किया मत कीजे
ऐसे जाम पिया मत कीजे
नए-नए जुमले घड़-घड़ कर
वे बोलेंगे सिर चढ़-चढ़ कर
मेंड़-मेंड़ पर उग आएंगे
वे बरसाती कुक्कुरमुत्ते
उनका नाम लिया मत कीजे
ऐसे जाम पिया मत कीजे
हरियाणवी कुंड़लिया
बहुअड़ बोल्ली जेठ तै, लम्बा घूंघट काढ़।
दीदे क्यूँ मटकावता, मुँह में दाँत न जाढ़।।
मुँह में दाँत न जाढ़, भाड़ सा इह नै खोल्लै।
नचकइये की ढाल़, ईलू इलल्लू बोल्लै।।
पड़ैं खोसड़े चार, सरम कर नीच पियक्कड़।
ले जूती नै हाथ, जेठ तै ंबोल्ली बहुअड़।।
तड़कै म्हारे खेत में, घुस बैठ्या इक सांड़।
मक्का अर तरबूज की, फसल बणा दी रांड़।।
फसल बणा दी रांड़, सांड़ नै कौण भगावै।
फुफकारै बेढाल़, भाज मारण नै आवै।।
खुरी खोद कै डुस्ट, भगावणिये पै भड़कै।
घुस बैठ्या इक सांड़, खेत में तड़कै-तड़कै।।
खत्म हुई हड़ताल
हँस-हँस कर बतिया रहे, बैठे दो कंगाल।
सुन कर उनकी वार्ता, चकित हुआ ‘वाचाल’।।
गाड़ी दो-दो आ गईं, बंगला आलीशान।
जनसेवक के ठाठ से, मन में उठे सवाल।।
पैसे-पैसे को रहा, जो पहले लाचार।
भूखा-नंगा था कभी, किस विधि मालामाल।।
बढ़ी ज़रूरत गृहस्थ की, नीयत आया खोट।
छोटा घोटाला किया, घर बैठी दो साल।।
फांकों के दिन आ गए, ढूंढ़ा एक उपाय।
अफ़सर आया रात घर, हो गई सुबह बहाल।।
डगमग-डगमग डोलता, राह चला ना जाय।
मुँह लटकाए आ रहा, अपना हिम्मत लाल।।
काया जरजर हो गई, साँस रहा है फूल।
राम-रमी निकले न मुख, सूख हुआ कंकाल।।
फितरत उसकी देखिए, बड़ा चतुर का बाप।
औरों की टोपी झटक, करता ख़ूब धमाल।।
सिर अपने शहतीर पर, देखे मुझमें खोट।
ढोल पीटता ज़ोर से, इसकी अँखियन बाल।।
अपनी मांगों के लिए, धरना दिया जमाय।
चौराहे पर बैठकर, पीट रहे करताल।।
अधिकारी बेचैन थे, खोजी इक तरकीब।
डब्बा दिया प्रधान को, खत्म हुई हड़ताल।।
साहित्यिक संसार मुझे
व्याकुलता क्रन्दन बन्धन से, आए चैन करार मुझे
दे असीम प्रेम अपना, या इत्ती सी तकरार मुझे
मैं लिखता जो सीधे अक्षर, टेढ़े-मेढ़े हो जाते
तेरी घुंघराली अलकों का, ऐसा चढ़ा ख़ुमार मुझे
चकाचौंध आँखें हो जाएँ, जिसकी स्वर्णिम आभा से
उसके हिस्से का थोड़ा सा, मिल जाए भण्ड़ार मुझे
विपुल सम्पदा नहीं चाहिए, ये तो आनी-जानी है
विप्र सुदामा का सा जीवन, किस विधि मिले उधार मुझे
बजा मुरलिया हे गिरिधारी, सुध-बुध खो जाए मेरी
लय मेरा तुझमें हो जाए, दे दे ये उपहार मुझे
चकित चकित सी भीड़ खड़ी हो, भारी यमुना के तीरे
उचक-उचक कर सारे देखें, करते नदिया पार मुझे
रोगों से कर मुक्त मुझे, अरु भोगों से छुटकारा हो
सर्वहितैषी महा चिकित्सक, ऐसा दे उपचार मुझे
जड़ जंगम कल्याण के हित में, सृजन करूँ माँ सरस्वती
दशकों-सदियों याद करे फ़िर, साहित्यिक संसार मुझे
घोर विरोध करें वे किन्तु, मैं फ़िर भी ‘वाचाल’ रहूँ
सत्य अहिंसा पर ही दृढ़ रह, चलने की दरकार मुझे
मैं वो मीठी याद नहीं
है कोई जो पत्नी की मनुहारों में हो व्यस्त नहीं
है कोई जो पत्नी के व्यवहारों से हो त्रस्त नहीं
होंगे बहुत भाग्यशाली पर मैं कोई अपवाद नहीं
जिसे ग़ौर से सुना गया हो मैं ऐसी फरियाद नहीं
किए हाड़ काले बहुतेरे फ़िर भी भृकुटी रही तनी
ज़रूरतों पर इच्छाओं की मार हमेशा रही बनी
भाग-भाग कर थक जाता विश्राम का जब-जब होता मन
तब ख़याल ये ही आता कि घर में होगी रार घनी
लेकिन कभी मर्द की भाँति किया न हो प्रतिवाद नहीं
क्या करता जिम्मा मेरा था तो ये सब करना ही था
विवाह बिना निर्वाह नहीं इस उक्ति को वरना ही था
शादी तो बरबादी है ये बहुत देर से पता चला
मजबूरी या फ़िर समाज के तानों से तरना ही था
जिसने पहली बार किया हो केवल वह उन्माद नहीं
दया-धर्म अरु हया-शर्म को अपनाया ये हाल हुआ
रँग जाता औरों के रंग में क्यों न मालामाल हुआ
है पूरा संतोष आत्मा मुझको देता है आशीष
इसी बहाने परमपिता ये मितभाषी ‘वाचाल’ हुआ
इस दुनिया का तुम जानो मैं उस घर में बरबाद नहीं
परछाईं सम पीछा करती अंधकार में रही न पास
जीवन के आखिरी दिनों में क़िस्मत का ऐसा परिहास
पूर्व जन्म के संस्कार कुछ ज़्यादा ग़लत किया होगा
अब तो अपनी बीनाई भी ये लो दिखती बहुत उदास
रखें संजो कर हृदय पटल पर मैं वो मीठी याद नहीं
छः तुकबन्ध
अपनों के बहकावे में हम ऐसे हुए अचेत
अलसाई मुट्ठी से फिसला जैसे बालू रेत
अपने थे जो सच में उनसे तोड़ लिए सम्बन्ध
अब पछताए होत क्या चिड़िया चुग गई खेत
आया सावन आई आंधी आए बदरा कारे
आँखें फथरा गईं न बरसा पानी खेत हमारे
आस लगाए बैठे पंछी आतुर पंख पसारे
आएँ बूंद नहाएँ हम भी उछल-कूद कर सारे
इठलाता झरना झरझरझर
इतराता पवन सरसरसरसर
इस ठण्ड़े मौसम में बेघर
इक बन्दर काँप रहा थरथर
ईख के खेत में
ईंट की मचान पर
ईशाक खा रहा
ईद की सिवाइयाँ
उमस भरी भादों की सुबह
उंगली थामे अम्मा की
उछल-कूदती जाती मुनिया
उ से उल्लू पढ़ने को
ऊबड़-खाबड़ गाँव के रस्ते
ऊँचे-नीचे गलियारे
ऊंट के मुँह में जीरा जैसे
ऊटपटांग मनरेगा
तेरे हिस्से के हलवे को
क़िस्मत में लिक्खा है तेरी, घोर ग़रीबी से ले टक्कर
पेट पीठ से चिपक रहेगा, तू क्या खाएगा घी-शक्कर
भोर हुई उठ उठा हाथ में, गैती-कस्सी ढूंढ़ ले धन्धा
तेरे साथी चले गए सब, दौड़ मिला ले उनसे कन्धा
पिछड़ गया तो पछताएगा, खाली हाथ लौट आएगा
बच्चे जब रोटी मांगेंगे, क्या कह कर तू बहकाएगा
उन्हें दिलासा देते-देते, आ ना जाए तुझको चक्कर
पत्नी है बीमार बहुत, और बेटी हुई सयानी बैठी
फूँस गल गया छान टपकती, बारिश भी आने को ऐंठी
दवा-दहेज़ जुटाना होगा, छप्पर नया बनाना होगा
भूखी अगन बुझाने खातिर, चूल्हा नित्य जलाना होगा
घोर निराशा में घबरा के, कहीं बैठ ना जाना थक कर
बेशक़ तन से चूर हुआ तू, चलने को मजबूर हुआ तू
कैसे किसका बने सहारा, बुझा हुआ तन्दूर हुआ तू
गँठी हुई हैं जूती-चप्पल, लत्ते तार-तार हैं तेरे
लगा हाजिरी द्वार रही है, विकट समस्या साँझ-सवेरे
तेरे हिस्से के हलवे को, कागा भागे छीन-झपट कर
यूँ ही लटका हूँ
इन मतवारे नयनों के निर्मल कोरों में
कजरारी सी खिंची हुई सुरमई डोरों में
बार-बार अटका हूँ
चलते-चलते राह प्रिय मैं लगातार भटका हूँ
तुम हो जैसे नभ में चन्द्र चरम यौवन पर
जिसे देख सागर में ज्वार उभर आता है
चला जा रहा शांत पोत मन का लहरों पर
डगमग डोले क्या फ़िर पार उतर पाता है
तुमने इन उद्दण्ड़ तरंगों ही के बल पर
उठा लिया पटका हूँ
भँवरा रस का लोभी बागों में जाता
लेकिन नहीं पुष्प को हानि पहुँचाता है
बल्कि लिपटा कर पराग निज पैरों में
वंशवृद्धि का शुभ संदेश छोड़ जाता है
मैं इसी स्नेह और आकर्षण के बन्धन में
उलझा हूँ-अटका हूँ
गाने को गाता हूँ गीत प्रेम रस के
किन्तु बिछुड़न के पल नहीं सहे जाते
उठते हैं जो भाव मेरे हृदय घन में
कहना चाहूँ फ़िर भी नहीं कहे जाते
क्या आसक्ति सचमुच इसको ही कहते
या यूँ ही लटका हूँ
हार्ट के हर लीफ़ पर
दोस्तो, मैं क़ाफ़िया-रदीफ़ लिखता हूँ
व्यंग में लपेटकर ग्रीफ़ लिखता हूँ
क्या करूँ डिटेल का ज़माना लद गया
इसीलिए संक्षेप में और ब्रीफ़ लिखता हूँ
मुफलिसी लाचारी तड़प रंजो-ग़म की मार है
यार, हँस-हँस कर मगर तक़लीफ लिखता हूँ
लायर चीटर लूटर शूटर हैं मेरे एड़वर्ब पर
ब्लैकबोर्ड़ पर बड़ा शरीफ़ लिखता हूँ
आ गया शफ़्फ़ाक़ कपड़े पहन कर पार्लियामेंट
लूटने बरसात में ख़रीफ़ लिखता हूँ
आप से डिफ़्रेंट हूँ ख़ुद से नहीं, मौला कसम
अपनी महफ़िल में बहुत तारीफ़ लिखता हूँ
क्या मिलेगा आपको पोस्टमॉर्टम के बाद
हार्ट के हर लीफ़ पर रिलीफ़ लिखता हूँ
बेबसी
जब-जब ख़ुद की कमजोरी से
चला जाता है अपना भविष्य
किसी निष्ठुर क्रूर कठोर के हाथ
तब-तब होता है जन्म
एक त्रासदी का
जिसकी यातनाओं को झेलने के लिए
कृत्रिम मुस्कान और कृतज्ञ चेहरे का आवरण
डाल लेना पड़ता है स्वयं पर
पूर्वाग्रहों की समस्त वेदनाएँ
उज्जवल भविष्य के ताप से
सूख जाती हैं
या
वाष्पायन की गुप्त ऊष्मा
झुलस देती है उन्हें
आराम कर रहा हूँ
एक गधे को मस्ती सूझी आँखें मूंदीं दौड़ पड़ा
पर उसकी क़िस्मत खोटी थी रस्ते पर था गढ़ा बड़ा
उसको ये मालूम नहीं था ऐसा भी हो जाएगा
मस्ती उसको ले डूबेगी और गधा कहलाएगा
गिरा गढ़े में मुँह के बल जब आँख खुलीं तो घबराया
अपनी मस्ती को कोसा फ़िर सिर धुन-धुन कर पछताया
पछताने से हासिल क्या अब कोई उपाय करो बेटा
इतना कह विश्राम मुद्रा में मंत्री की भाँति लेटा
घबराहट हुई दूर हुआ मन शांत गधा फ़िर मुस्काया
मैं भी कितना बेवकूफ हूँ ख़ुद को समझ नहीं पाया
मुझमें इतनी ताक़त है कि भरूँ छलांग निकल जाऊँ
झाड़ूँ चार दुलत्ती दौड़ूँ फ़िर हौंची-हौंची गाऊँ
बस क्या था वह लगा उछलने बहुतेरा प्रयास किया
लेकिन सारे थके पराक्रम क़िस्मत ने परिहास किया
चिन्ता ने घेरा उसको तो लेट गया तिरछा-बाँका
इतने में खरगोश मियाँ ने ऊपर से नीचे झाँका
बोला, मामा ख़ुद लेटे या किसी दुष्ट ने धकियाया
ऐसा क्या हो गया अचानक जो मैं समझ नहीं पाया
गरजा खर, ख़ामोश भांजे! नव आयाम भर रहा हूँ
बहुत दिनों का थका हुआ था अब आराम कर रहा हूँ
ऐसा छोड़ असर जा तू
मरना है तो मर जा तू
पाप-पुण्य से तर जा तू
तप कर कंचन बना लिया
थोड़ा और निखर जा तू
दुनिया रो-रो याद करे
ऐसा ही कुछ कर जा तू
कंक्रीट के झाड़ों में
बनके राख बिखर जा तू
तन के तीर नहइयो मत
मन के घाट उतार जा तू
सिर धर पाप घड़ा अपने
धन घर में मत भर जा तू
सपने तो सपने हैं, पर
सपनों में रँग भर जा तू
क़िस्मत साथ नहीं दे तो
उसके पंख कतर जा तू
आहें भरते लोग रहें
ऐसा छोड़ असर जा तू
एक चने ने
मेरे आँगन रोज़ सवेरे, बुलबुल आती एक
सच्च बोलो-सच बोलो की, मधुर लगाती टेक
मधुर लगाकर टेक, मुझे हैरान करे
कैसी खोटी बातें, ये नादान करे
झूठा और बेईमान, भला सच कैसे बोले
ज़हर बेचने वाला, अमृत कैसे तौले
मूरख पंछी मुझको, कैसी सीख दे रहा
नहीं चाहिए बिन मांगे, क्यों भीख दे रहा
ढूंढ़ कोई घर और, यहाँ न दाल गलेगी
मीठी-मीठी बोली, मुझको नहीं छलेगी
दाना डाल दिया है, खा या हो जा फुर्र
हैरत से मत देख, निठल्ले टुकुर-टुकुर
भड़काया तो पछताएगा, रार बढ़ेगी
जीवन भर ना भूले, ऐसी मार पड़ेगी
पंछी फुदक-फुदक कर बोला, सच बोलो
मेरे दिल ने कहा, यार आँखें खोलो
क्रोध पे पानी डाला, एक परिंदे ने
बदल लिया मन, इस दुर्दान्त दरिंदे ने
पर उसके साहस को, मैं नहीं सका पचा
एक चने ने, भाड़ फोड़ इतिहास रचा
चिड़िया ने यार बनाया है
इस मुख पोथी ने तो अपना, जीना दुश्वार बनाया है
थे शहद से भी मीठे, इसने मिर्ची का अचार बनाया है
पत्नी कहतीं चाय पी लें, हम कहते अभी फुर्सत है कहाँ
थी लत हमको तो कोई नहीं, इसने लाचार बनाया है
थे चुस्त दुरुस्त ख़ुशोखुर्रम, परवाह न थी बेशक़ कोई
अब वैद्य ढूंढ़ते फिरते हैं, इतना बीमार बनाया है
कोई नशा छुड़ाने वाला हो, परिचित तो मदद करें मेरी
दीवार पे लिखने वालों ने, इसको व्यापार बनाया है
ख़बरें सुन लो बातें कर लो, दुनिया भर की दुनिया भर में
बुद्धू बक्से का क्रेज़ घंटा, चिड़िया ने यार बनाया है
आज क्यों बेचैन हो तुम
न देखा था तुम्हें पहले कभी ऐसे क्षणों में
कठिन है इस स्थिति में प्रिय निर्वाह करना
मिला कर आँख शरमाना झुकाना हाथ मलना
दबाना होंठ दाँतों के तले फ़िर आह भरना
उषा की लालिमा थीं आज कैसे रैन हो तुम
हँसी फूलों का झरना केश इतराती घटा
नयन अमृत कलश और वक्ष की उपमा ही नहीं
सलोनी साँवली सूरत अदाएँ शोख़ चंचल
बहुत खोजा मिली तुम सी कोई प्रतिमा ही नहीं
सत्य मानो विधाता की अद्वितीय देन हो तुम
मचलती साँस की अव्यक्त सी ये छटपटाहट क्यों
धड़कता दिल अविरल गीत कैसा गा रहा है
उमड़ती भावना अंतस में क्या कुछ कह रही है
वो भय कैसा है जो इसको दबाए जा रहा है
ये ख़ामोशी नहीं अच्छी कि मीठे बैन हो तुम
अभी वक़्त है चेत जाइये
घंटों नींद उड़ाने वालो!
छक्के रोज़ छुड़ाने वालो!
साँस चैन की छीन रहे हो;
क्यों उद्विग्न चिढ़ाने वालो!
जात पे अपनी मैं आया तो;
जात बचाना मुश्किल होगा।
मुझे पचाना मुश्किल होगा।
क्यों घातों पर घात कर रहे?
बेमतलब बेबात कर रहे?
मैं इतना सब सहन कर रहा;
लेकिन तुम उत्पात कर रहे।
गर मैंने गांड़ीव उठाया;
तो बच पाना मुश्किल होगा।
मुझे पचाना मुश्किल होगा।
हद सारी ही पार किये हो।
क्या ये पहली बार किये हो?
कहाँ-कहाँ तक क्षमा करूँ मैं;
छलनी बारम्बार किये हो।
लांघ गया मैं हद तो सोचो;
यहाँ ठिकाना मुश्किल होगा।
मुझे पचाना मुश्किल होगा।
इसीलिये अब शांत बैठिये।
ऐसे ज्यों सम्भ्रांत बैठिये।
अच्छा होगा सम्हल जाइये;
जा मित्रों की पाँत बैठिये।
फ़िर भी मिलकर नहीं चले तो;
लाज बचाना मुश्किल होगा।
मुझे पचाना मुश्किल होगा।
तुम सा दिखने को जी चाहे
जिस दिन से देखा है तुमको, मेरा बिकने को जी चाहे
भगवान कसम सच कहूँ प्रिय, कविता लिखने को जी चाहे
सारी दुनिया का आकर्षण, आ सिमटा इन दो नयनन में
क्या यतन करूँ हे देव, अवश कर रहा मुझे ये आकर्षण
चन्दन वन की सारी सुगंध, बस गई सजनी तेरे तन में
कोमल तन भावुक मन चंचल लोचन देते हैं आमंत्रण
है ज्ञात दुपहरी जेठ की है, फ़िर भी सिकने को जी चाहे
कुन्तल कमनीय कपोल कमल कोकिल कण्ठी केसर क्यारी
कंचन काया कोमल कोमल कचनार कली कच्ची कच्ची
सरिता समान सलिला सुखदा स्नेहिल सर्वांग सुघड़ सुन्दर
सुख सुविधा सम सम्पन्न सहज सम्बन्धों सी सच्ची सच्ची
मैं हूँ अरूप तुमको पाकर, तुमसा दिखने को जी चाहे
लौट रहा है फ़िर कोरोना
किस को रोना, काहे रोना
दुःख देता अपनों को खोना
बड़ी आपदा बनकर आया
जान का दुश्मन वो कोरोना
सावधानी यदि तनिक हटी तो
पड़ जाए दु:क्यों को ढोना
सबसे सरल उपाय यही है
दो गज की दूरी का होना
यदि नहीं कोई काम आपको
तान चदरिया घर में सोना
चिन्ता से कोई बात बनी क्या
व्यर्थ रहेगा चिन्तित होना
भोजन भजन शयन से पहले
मल मल कर हाथों को धोना
कहीं किसी अपने प्यारे का
टूट न जाए सपन सलोना
परहेजों पर ध्यान दीजिए
लौट रहा है फ़िर कोरोना
दुष्कर्मों के भूतों द्वारा
थोड़ा ईंधन या फ़िर मिट्टी, सिवाय इसके कुछ भी नहीं;
अन्त समय में बुरा-भला सब, छाती पर रख ले जाना है।
धन-दौलत शौहरत पद गरिमा, यहीं धरे रह जाएंगे;
मरघट तक का साथ, बाद में खाली हाथ चले जाना है।
तेरी-मेरी इसकी-उसकी, ये सब करते बीता जीवन;
क्या पाया क्या खोया आख़िर, घिस घिस हाथ चले जाना है।
बोझिल पलकें नीची ग्रीवा, मंथन मन सतत करे तेरा;
दुष्कर्मों के भूतों द्वारा, अब दिन-रात छले जाना है।
काशी उज्जैयिनी की बात
कीजे दिल से दिल की बात
अच्छे मुस्तकबिल की बात
सारे दस्तूरों पर भारी
तेरे-मेरे दिल की बात
छोड़ो बीते कल की बात
मक्कारी छल बल की बात
वर्तमान में शुरू कीजिये
आने वाले कल की बात
मनभावन सावन की बात
मस्त मस्त फागन की बात
काशी उज्जैयिनी संग करिये
मथुरा वृन्दावन की बात
पुण्य के घाटों पे
पुर्जा-पुर्जा हो रहा है आदमी
बोझ लेकिन ढो रहा है आदमी
रोज़मर्रा का यही ढर्रा रहा
आग-पानी हो रहा है आदमी
आँधियों का डर रहा हरदम मगर
छान ताने सो रहा है आदमी
हो गया कुछ चीज़ मिलने में विलम्ब
धैर्य कैसे खो रहा है आदमी
नींद से उठ जाग आधी रात को
बेबसी पर रो रहा है आदमी
तीर तर्कश के हुए सब कुन्द पर
चतुर विजेता हो रहा है आदमी
पुण्य के घाटों पे घिस्से मार कर
पाप अपने धो रहा है आदमी
वरना मिट नाम निशान गया
चुटकी सिन्दूर की क़ीमत क्या
ये अपना दुश्मन जान गया
भारत पहले सा नहीं रहा
यह सच्चाई पहचान गया
हमने सीमा में घुसे बिना
उसके हथियार उड़ा डाले
आतंकी कैसे ढेर किए
मिनटों में टूट गुमान गया
उसने कायर सम वार किया
आगाह किया हमने पहले
फ़िर जब सटीक गोले दागे
दहशत का लुट सामान गया
परमाणु धमकी देता था
हमने वे अड़्ड़े गढ़े किए
घुटनों पर आया तब मुनीर
ट्रम्पू का ले अहसान गया
डीजीएमओ उसका रोया
अब बस भी करो बाप मेरे
छाती पीटी नथुने रगड़े
पिछवाड़ा ऊपर तान गया
अमरीका को वायर भेजा
फ़िर चीन को लायर बना लिया
कोई तो बात रही होगी
जो भारत जल्दी मान गया
ये सीज़फायर तत्कालिक है
अब प्रलयंकर हमला होगा
आतंकी सारे सौंप हमें
वरना मिट नाम निशान गया
दिल की सुन
धक धक कर ये क्या कहता है
इसकी धड़कन को पहचान
दिल की सुन तू दिल की मान
मन मैला मस्तिष्क बवंडर
चित्त चपल विघ्नों की खान
दिल की सुन तू दिल की मान
बुद्धि करती रहे विवेचन
दिल लेता फौरन संज्ञान
दिल की सुन तू दिल की मान
इक मेरे साथ है
चेहरा सपाट होना क़िस्मत की बात है।
ऊँचा ललाट होना मुकद्दर के हाथ है।
बीवी बता रही थी गंजू पटेल की-
इक चाँद आसमां में इक मेरे साथ है।
कीट-पतंगा तन
उजले कपड़े नंगा तन
चिथड़े-चिथड़े चंगा तन
जलने को मजबूर रहा
मेरा कीट-पतंगा तन
क्या नेता क्या न्यायाधीश
सब के तेल मलंगा तन
उधड़ा-उधड़ा रहा किया
सदियों अपना दंगा तन
आस लगाए औरों से
सनातनी भिखमंगा तन
पाप-शाप धोता रहता
लेकर डुबकी गंगा तन
फ़िर भी कभी-कभी तन कर
लेता रहता पंगा तन
राजनीति में
राजनीति में आ गए, जब से चारा चोर।
पशुओं में उल्लास है, हैं आनन्द विभोर।।
हैं आनन्द विभोर, मोर भी चहक रहे हैं।
खा कर गोली भांग, गधे तक बहक रहे हैं।।
मनवा बड़ा उदास, हुआ बेसुध अनीति में।
कैसे-कैसे ढोर, आ गए राजनीति में।।
हँसकर उसे निगल मितरा
जब खड़क उठें घर के पर्दे
इल्जाम कोई कब सर धर दे
कैसे बच बचकर चले कोई
विश्वास नसों में विष भर दे
शादी ख़ाना आबादी का
ये नया चलन कब क्या कर दे
मुस्कान कहाँ साहिल के सँग
पति सौरभ के टुकड़े कर दे
मौसम घनघोर सँभल मितरा
तूफ़ां का ज़ोर सँभल मितरा
घर ही में चोर सँभल मितरा
ख़तरा चहुँओर सँभल मितरा
लो खुलेआम जज के आगे
जब पेशकार रिश्वत लेता
बेधड़क मुवक्किल को थपकी
दे करे इशारा अधिवक्ता
वादी प्रतिवादी की जेबें
लुटने को हों अभिशप्त जहाँ
मैं सोच रहा ख़ामोश खड़ा
अब न्याय मिले कैसे सस्ता
इसलिए मुकदमेबाजी की
गलियों से दूर निकल मितरा
गर आ ही पड़े थाली में तो
फ़िर हँसकर उसे निगल मितरा
किससे दिल की बात कहूँ
ये प्यार मुहब्बत के झौंके
क्यों अमन पसंदों ने रोके
सौहार्द बढ़ाने निकले थे
भर आँखों में नफ़रत-धोख़े
हैं लोग दुरंगी चाल लिए
इनसे बच बचकर चलना सीख
अब दुनिया ख़ूनख़राबा है
तू संभल-संभल कर चलना सीख
थमता नफ़रत का शोर नहीं
मेरा इसपे कुछ ज़ोर नहीं
कैसै थोड़ा पानी डालूँ
भाईचारे का दौर नहीं
इसलिए मान इच्छा उसकी
अपने घर में चुप बैठ रहूँ
मैं किससे दिल की बात कहूँ
सोचकर घबराएँ
छल कपट झूठ के मेले हैं
नफ़रत हिंसा के खेले हैं
कैसे काजल की कोठी से
बिन कालिख पार उतर पाएँ
ये सोच सोचकर कर घबराएँ
हिम्मत हारे में होगा क्या
मत बंटवारे में होगा क्या
बुझ गए अगर दीपक सारे
फ़िर अँधियारे में होगा क्या
जब भरे उजाले लुटते हों
तिमिरों में कैसे बच पाएँ
ये सोच सोचकर कर घबराएँ
इस घोड़े पर अंकुश तान
मन के घोड़े चढ़ने वाले
दिल की कर तू दिल की मान
दिल पल-पल संकेत दे रहा
करने तुझे सचेत दे रहा
इस कोने से दूर क्षितिज तक
लम्बे-चौड़े खेत दे रहा
तार मिला दिल के भूमा से
इन संकेतों को पहचान
दिल की कर तू दिल की मान
लख चौरासी घूम घूमकर
मगन रहा तू झूम झूमकर
अब मानव योनि में आया
श्री चरणों को चूम चूमकर
पुनर्अपि जननी जठरे शयनम
इन कष्टों का ढूंढ़ निदान
दिल की कर तू दिल की मान
चेतन मन चण्ड़ाल छलेगा
भीतर निश्चित पाप पलेगा
संयम को ललकारेगा वह
भाँति-भाँति की चाल चलेगा
ले कठोर निर्णय अज्ञानी
इस घोड़े पर अंकुश तान
दिल की कर तू दिल की मान
एक बार जो जीत गए तो
जनता में विश्वास जगाएँ
थोड़ी अपनी पैठ बढ़ाएँ
इंड़ी फेल हुआ है तो क्या
चलो एक दल नया बनाएँ
राजनीति के मकड़जाल सी
अधरों पर मुस्कान लिए
मफ़लर स्वैटर टोपी चप्पल
कंगालों सी शान लिए
जनता के काँधे चढ़ जाएँ
किस को याद रहा है कब-कब
किस ने किस-किस को लूटा
कब फ़िर धोती-जूती वाला
पहन लिया सूटा-बूटा
जनमानस को फ़िर उलझाएँ
गुमनामी में बीता जीवन
अब आकर्षक चहल-पहल
रहते थे छोटी कुटिया में
अब घुस बैठे शीशमहल
हम भी कोई जुगत भिड़ाएँ
बीत चुका है आधा जीवन
क्यों लेटें टूटी खटिया
भरी जवानी के मेले में
रहे भटक बारह बटिया
अब अपने को क्यों भटकाएँ
एक बार जो जीत गए तो
पैसा आएगा अंधा
थेली नहीं दुअन्नी लगती
इससे अच्छा क्या धंधा
आओ ये व्यापार उगाएँ
आओ मिलकर देश बचाएँ
आओ बैठो रागिनी गाएँ
तुम और मैं अब हम हो जाएँ
पैंतीस और छत्तीस भूलकर
आपस में सौहार्द बनाएँ
आग लगाकर उसे बुझाना
ये नाटक है खेल सियासी
नेताओं के इस चंगुल से
समय आ गया मुक्ति पाएँ
कौन किसे क्या देता सोचो
जब लेने की होड़ लगी हो
तेरा मेरा सबका हिस्सा
वे हड़पेंगे वे खा जाएँ
रेल उखाड़ो सड़कें खोदो
ये भरपाई हो जाएगी
लौट के वे ना आने वाले
जो ऐसे में जान गँवाएँ
नेताओं का कौन मरा कब
वे तो बस मरवाने वाले
हम सब का है भला इसी में
इनको मिलकर सबक सिखाएँ
आओ बैठो गोल मेज़ पर
कुछ ना कुछ तो हल निकलेगा
वरना वे तुम पर तुम उन पर
ऐसे ही इल्जाम लगाएँ
नहीं बचपन आया
क्यों रिश्तों में आज खोखलापन आया
काहे को सरकार दोगलापन आया
खण्ड़हर हुए मकान मरम्मत कौन करे
पड़ने लगीं दरार बुरा सावन आया
बना परस्पर दुश्मन भाई का भाई
जब मरने के बाद पिता का धन आया
बेशक़ रहा मलाल उम्र जब बीत गई
तब जाके हमको जीने का फन आया
तू ‘वाचाल’ नसीबों वालों से कमतर
तेरे हिस्से कभी नहीं बचपन आया
अपनेपन की बात
तेरे-मेरे मन की बात
फागुन की सावन की बात
सम्बन्धों की फुलवारी
बिछुड़न कभी मिलन की बात
पल-पल की छिन-छिन की बात
करिये घर आँगन की बात
नश्वर प्राणी चलती रहती
जीवन और मरण की बात
धूल फाँकती क्यों ‘वाचाल’
अब ये अपनेपन की बात
वन में फूले नहीं पलाश
सूना-सूना है मधुमास, होली कैसे खेलूँ भैया।
मेरा मनवा बड़ा उदास, होली कैसे खेलूँ भैया।
नीरव ललित माल्या मेहुल, करते हैं अय्याशी।
किन्तु अन्न उगाने वाले, झूलें निशि दिन फाँसी।
खाँसी छीन रही है साँस, होली कैसे खेलूँ भैया।
हम अपने-अपने घर आँगन, खेल रहे हैं होली।
सीमाओं पर मगर प्रहरी, झेल रहे हैं गोली।
बोली इक शहीद की सास, होली कैसे खेलूँ भैया।
ताक धिनाधिन ढोल बज रहे, नेताओं के घर पर।
मेहनत-मजदूरी वालों के, सूने-सूने छप्पर।
खप्पर रोक रहा उल्लास, होली कैसे खेलूँ भैया।
पीने का पानी सिर ढोते, आज हमारे गाँव।
लगन धरी लड़की फिसली तो, मोच आ गई पाँव।
छाँव में बैठी बड़ी निराश, होली कैसे खेलूँ भैया।
घोर ग़रीबी लगा रही है, गाँव-गली के फेरे।
रूखे-सूखे सारे चेहरे, चिन्ताओं ने घेरे।
मेरे औंधे पड़े हुलास, होली कैसे खेलूँ भैया।
आशंका सी जाने कैसी, पनप रही जन-जन में।
आक्रोश संकोच और है, उद्वेलन तन-मन में।
वन में फूले नहीं पलाश, होली कैसे खेलूँ भैया।
हाथ दराँती खेत जा रही, बालक लिए बगल मा।
पशुओं को चारा लाएगी, दुबली-पतली सलमा।
बलमा खेल रहा है ताश, होली कैसे खेलूँ भैया
फैलाए अपना आँचल
बैरी मनवा बड़ा विकल
साँसों में क्यों उथल-पुथल
किसने क्या कुछ कह डाला
मची हुई है क्यों हलचल
उद्वेलन अरु आशंका
व्हिवलता कैसी पल पल
एकाकी हूँ सूनापन
अँधियारे का है छल बल
सोच रहा मैं पड़ा-पड़ा
कैसे कब निकलेगा हल
कोई ढांढ़स बँधा रहा
फैलाए अपना आँचल
चढ़े नक़ाब की
बढ़ रही धड़कन न जाने क्यों दिले-बेताब की
होश में आने न देगी याद हमको ख़्वाब की
हँसने लगा कमबख़्त सुनके दास्ताने-इश्क़ तो
क्यों करूँ मैं बात महवे-बालिशे-कमख़्वाब की
होने लगा कुछ-कुछ कलेजे में हमारे उस घड़ी
रक़्स जब करने लगी परछाईं माहताब की
फितरतन जो लूट के दरिया में गोते खा रहे
क्या करें उनसे हिफ़ाज़त माल की असबाब की
धीरे-धीरे अब हक़ीक़त सामने आने लगी
उनके काले कारनामों पर चढ़े नक़ाब की
एकाकी ( नवगीत )
अस्ताचल गया सूर्य, मंद पड़ा प्रकाश।
विहग नीड़ लौट रहे, साँझ हुई उदास।
भाव उमड़ घुमड़-घुमड़, धनु संधान रहे।
और असहाय के यूँ, नौंचत प्रान रहे।
सूनी चट्टान जहाँ, कोई नहीं पास।
विहग नीड़ लौट रहे, साँझ हुई उदास।
शंख सा आकाश है, गोधूलि जो उड़ी।
पीर सी मीठी चुभन, सुखा रही पंखुड़ी।
नीर नयन गहन अगन, रोकते उल्लास।
विहग नीड़ लौट रहे, साँझ हुई उदास।
मन की व्यथा उड़ेलें, स्वर-व्यंजन सारे।
कण्ठ घुला क्रंदन है, दिवस दिखें तारे।
जल विहीन छटपटात, मत्स्य सा उजास।
विहग नीड़ लौट रहे, साँझ हुई उदास।
वासंती गीत
जब बसंत की आहट पाई, तब ही आरम्भ हुआ पतझर
निर्वसन से वृंत खड़े सूने, जा दूर गिरे पत्ते झड़कर
फ़िर नव कलिकाएँ मुदित हुईं, नव सृजन का कारण बनकर
भर गईँ शाखाएँ पत्तों से, फूलों ने कहा खुल के हँसकर
आरम्भ करें हम नव जीवन, उन भँवरों को आमंत्रित कर
रसपान करें वे झूम-झूम, दें शुभ संदेश परागन कर
लहलहा उठा शहतूत, हरे पत्ते व लम्बे फल पाकर
अमवा के बिरवे चहक उठे, बौर इयाँ आईं जामुन पर
जब लगन धरी युवती निकली, सखि संग मगन परिणय पथ पर
तो मेहंदी लगे सुकुमार पाँव में, एकाएक चुभा कंकर
मेरे हृदय में शूल उठा, उसकी पीड़ा को अनुभव कर
क्या लगा आपको भी ऐसा, कह भी दीजे कुछ तो कविवर
कन्या सोल्लास विदा कर के, हर्षित-उल्लसित नयन भर कर
चन्दो चाची ने जौ बोए, गंगा में जय जय शिवशंकर
लहरातीं फसलें खेतों में, नभ में घनघोर घटा उठकर
कृषकाय कृषक को कँपा रहीं, चहुँओर बिजलियाँ तड़-तड़ कर
मैं दुबका हुआ अटारी में, रहा इन्द्र देव से विनती कर
हे देव न हों निष्ठुर इतने, भयभंजक! संहारक बनकर
फागुनी गीत
फगुनाई अँगड़ाई कसमसाई देह में,
नाच उठा मन मोर आय गयो फगुना।
झूम उठे चाँद तारे मेरे संग-संग सारे,
मीठी कसक टीस सी उठा गयो फगुना।
हेरी प्यारी मति मारी ठिठोली करे तू भारी,
दूर नदी तीर शीघ्र बांसुरी बजाएगो।
देख रही राह खड़ी जोह रही बाट बड़ी,
मेरो चितचोर भोर भये घर आएगो।
लाएगो चुनर धानी कह ओढ़ लेओ रानी,
मेरी मनुहार आली प्रेम सौं करेगो वो।
तेरो भी करेजा हूक होए तब टूक-टूक,
नैक सौ सिन्दूर मेरी मांग में भरेगो वो।
लाएगी उमंग रंग जब मेरे संग-संग,
आस में हुलास कहें आय गयो फगुना।
छोकरी भी डोकरी भी ले के फूल टोकरी में,
झूम-झूम गाने लगें आयो आयो फगुना।
विश्व महिला दिवस
बाल आश्वासन
तेरी सारी तक़लीफ़ों को दूर करुंगा,
माँ! मैं तनिक बड़ा हो जाऊँ।
रहा सलामत ये तन और ये जीवन तो-
नियति को भी झुकने पर मजबूर करुंगा,
माँ! मैं तनिक बड़ा हो जाऊँ।
क़िस्मत में क्या लिक्खा है ये ज्ञात नहीं।
लेकिन घबराने की कोई बात नहीं।
भिड़ जाउंगा आफ़तों-तूफ़ानों से,
होंगे काले दिन और सूनी रात नहीं।
हर मुश्किल को बेशक़ चकनाचूर करुंगा,
माँ! मैं तनिक बड़ा हो जाऊँ।
मेरा देख हौसला जब घबराएंगे।
दुर्दिन भागेंगे, अच्छे दिन आएंगे।
यक़ीन रख के अम्मा दे आशीष मुझे-
हम सब मिलकर नया सवेरा लाएंगे।
वचन निभाने की कोशिश भरपूर करुंगा,
माँ! मैं तनिक बड़ा हो जाऊँ।
नवगीत बाबा (पिता)
टूटे टप्पर का ढाबा,
पौली की तरेड़ जैसा। (मुखड़ा)
हो गया निस्पात बाबा,
एक सूखे पेड़ जैसा। (टेक)
ठूंठ सी बहियाँ पे झूल,
बेटी पींगें बढ़ा रही।
उमड़ कर नभ में घटा भी,
त्यौरी अपनी चढ़ा रही।
क्षितिज पर चन्दा खड़ा ज्यों,
तिमिर से मुठभेड़ जैसा।
अंग-अंग भेंट घात की,
तार-तार होती चमड़ी।
श्रम-स्वेद असीम पातकी,
तरसा रही धेली-दमड़ी।
हलस काँधे धरे आए,
लस्टपस्ट अधेड़ जैसा।
डगमगाते पाँव इसके,
बोझ जो सिर पर धरा है।
फुर्सत कहाँ सहला सके,
घाव जो अब तक हरा है।
पीर सीने में दबाए,
चीसती कन्फेड़ जैसा।
ब्लैक बोर्ड पर
दोस्तो, मैं काफ़िया-रदीफ़ लिखता हूँ
टौन्ट में लपेट कर ही ग्रीफ़ लिखता हूँ
क्या करूँ डिटेल का ज़माना लद गया
इसीलिए शौर्ट में कुछ ब्रीफ़ लिखता हूँ
लायर चीटर लूटर शूटर हैं मेरे एड़वर्ब पर
ब्लैक बोर्ड पर बड़ा शरीफ़ लिखता हूँ
आ गया शफ़्फ़ाक़ ड्रैस पहन कर पार्लियामेंट
लूटने बरसात में ख़रीफ़ लिखता हूँ
क्या मिलेगा आपको पोस्टमॉर्टम के बाद
हार्ट के हर लीफ़ पर रिलीफ़ लिखता हूँ
कुछ मुक्तक
सोने का पानी चढ़वा कर पीतल चिढ़ा रहा गहनों को।
अब्दुल्ला का टेढ़ा आँगन ठेंगा दिखा रहा गहनों को।
थोथा चना बाजता ज़्यादा सही कहावत सिद्ध हुई –
रानू मंड़ल राग सिखाए लता और आशा बहनों को।
महकते इक फूल सा खिलने भी आया कीजिये।
घाव औरों के कभी सिलने भी आया कीजिये।
एक दिन भगवान ने इक बड़ा सा ताना दिया –
मांगने आते हो बस, मिलने भी आया कीजिये।
होता हो अपमान निरंतर फ़िर भी धैर्य बनाए रख।
खट्टा-मीठा कटु-कसैला सारे स्वाद हमेशा चख।
प्रतिक्रिया में उलझा तो पुरुषार्थ व्यर्थ हो जाएगा –
आँख लक्ष्य पर बनी रहे उद्देश्य रंग हो जाए चटख।
भागते-भागते साँझ कब हो गई।
बेटी-बेटे तो हैं बाँझ कब हो गई।
आया पतझड़ के जैसा बुढ़ापा तो फ़िर –
मृदु मुरली की धुन झाँझ कब हो गई।
बहुत झुलसना पड़ता लोगो उजला-उजला दिखने को।
भीतर बहुत उलझना पड़ता बाहर सुलझा दिखने को।
सोना तप कर कंचन बनता, ऐसा सब ही कहते हैं –
हम अपने को तपा रहे हैं धुंधला-धुंधला दिखने को।
बुद्धू बक्से का क्रेज़ घटा
इस मुख पोथी ने तो अपना जीना दुश्वार बनाया है
थे शहद से भी मीठे इसने मिर्ची का अचार बनाया है
पत्नी कहतीं चाय पी लें हम कहते अभी फुर्सत है कहाँ
थी लत हमको तो कोई नहीं इसने लाचार बनाया है
थे चुस्त-दुरुस्त ख़ुश-ओ-खुर्रम परवाह न थी बेशक़ कोई
अब वैद्य ढूंढ़ते फिरते हैं इतना बीमार बनाया है
कोई नशा छुड़ाने वाला हो परिचित तो मदद करें मेरी
दीवार पे लिखने वालों ने इसको व्यापार बनाया है
जब चाहो जितनी चाहो बातें कर लो दुनिया भर में
बुद्धू बक्से का क्रेज़ घटा चिड़िया से प्यार बढ़ाया है
गुफा में आराम करें
आपने पुकारा नहीं मेरा साहस हुआ ना,
इसे बस भाग का ही खेल मान लीजिए।
दोनों ही की ज़िंदगानी हुई बरबाद ऐसे,
दोनों की थीं कुंडली बेमेल मान लीजिए।
परम पिता को यदि साथ ये मंज़ूर होता,
कैसे छूट जाती फ़िर रेल मान लीजिए।
चलो किसी बाबाजी की गुफा में आराम करें,
कायनात गई लेने तेल मान लीजिए।
कदम चले छह-आठ
पीर समझने वाले ग़म ही बदल गए
वक़्त कहाँ बदला है हम ही बदल गए
भोर किरन है कली खिलन आभास कहाँ
ऋतुओं के बढ़ रहे कदम ही बदल गए
जिन पर फ़िदा हुआ करते थे दीवाने
उन जुल्फ़ों के पेचो-खम ही बदल गए
फूलों के हड़ताली तेवर उभर रहे
ख़ुश रहने वाले मौसम ही बदल गए
ख़्वाब दिखाए साथ चलेंगे मंज़िल तक
कदम चले छह-आठ सनम ही बदल गए
कदम चले छह-आठ
पीर समझने वाले ग़म ही बदल गए
वक़्त कहाँ बदला है हम ही बदल गए
भोर किरन है कली खिलन आभास कहाँ
ऋतुओं के बढ़ रहे कदम ही बदल गए
जिन पर फ़िदा हुआ करते थे दीवाने
उन जुल्फ़ों के पेचो-खम ही बदल गए
फूलों के हड़ताली तेवर उभर रहे
ख़ुश रहने वाले मौसम ही बदल गए
ख़्वाब दिखाए साथ चलेंगे मंज़िल तक
कदम चले छह-आठ सनम ही बदल गए
मुहब्बतों के दीप
गाड़ी को पटरी पर लाना भूल गए
हम कैसे घर-बार चलाना भूल गए
अपनी-अपनी मस्ती में डूबे हैं सब
इक-दूजे को पास बिठाना भूल गए
छोटी-छोटी बातों पर जो टूट रहे
हम ऐसे परिवार बचाना भूल गए
जुगनू के पर कतर उजाला करते हैं
मुहब्बतों के दीप जलाना भूल गए
आओ मिलकर हम सारे कोशिश कर लें
चलिए उस घर जिस घर जाना भूल गए
पलट कर देखे
कैसा लगता है तब
जब दो दिन की सूखी
बाजरे की आधी रोटी को
धरती पर धरे
कोई सिल पर हरी मिर्चें रगड़ रहा हो
आँख-नाक में आए पानी को
चिथड़े हुई कमीज़ के
बाएँ आस्तीन से पौंछते हुए
ख़ाली कुल्हड़ भरने घड़े तक जाए
पलट कर देखे
लुटेरा सा एक कौवा
उस चिरप्रतीक्षित टुकड़े को
चौंच में पकड़
छप्पर के बाँस पर जा बैठे
पंजे में पकड़ खाने लगे
क्यों मगर इस नाख़ुदा को
रूठ कर जब मैं चला तो रुक ज़रा भी ना कहा
बावफ़ा उसने कहा ना बेवफ़ा भी ना कहा
शे’र पहला जब पढ़ा मैंने नशेड़ी की तरह
शुक्र है अल्लाह का मुझको शराबी ना कहा
जो ग़ज़ल मैंने कही बेशक़ तरन्नुम में न थी
पर किसी ने भूल से क्यों बेसुरा भी ना कहा
चुटकुले भरपूर मैंने भी सुनाए थे मगर
क्यों मुझे श्रोतागणों ने मसखरा भी ना कहा
गीत जब मैंने सुनाया प्यार का श्रंगार का
मरहबा तो छोड़िए मर बेहया भी ना कहा
एक कतआ जब उछाला नाज़नीं को घूर के
मंच ने ठरकी कहा ना भीड़ ने भी ना कहा
मैं ये कश्ती खींच कर साहिल पे लाया किस तरह
क्यों मगर इस नाख़ुदा को शुक्रिया भी ना कहा
सही करीना सीख
तू गर दौलत वाला है तो सब ही तेरे गुण गाएंगे
निर्धन है तो ये जग वाले सब तेरी हँसी उड़ाएंगे
इसलिए स्वयं संयम रख कर अपने अश्कों को पीना सीख
ये दुनिया खेल-तमाशा है तू बन के जोकर जीना सीख
वे बोलेंगे मीठा-मीठा पर भीतर भरा हुआ मैला
जो भटक रहे ले इधर-उधर नफ़रत का भरा हुआ थैला
इसलिए यही बेहतर बन्धू पहचान का सही करीना सीख
ये दुनिया मतलब वालों की तू बन के जोकर जीना सीख
मुक़द्दस ग़ज़ल
ख़ौफ़ में है हर बशर
ठूंठ से सारे शज़र
किस कमीने की इधर
पड़ गई सब पर नज़र
कौन जाने किस घड़ी
टूट पड़ जाए क़हर
हर दुआ अब क्यों यहाँ
हो रही है बेअसर
खोजते मकरंद वे
घोलते रहते ज़हर
झट उड़ लटका डाल
आज पुनश्चय पीठ पर, चढ़ बैठा वैताल।
प्रश्न करेगा ये कठिन, मुखड़ा मेरा लाल।।
टेढ़ा बहुत सवाल है, भ्रम मत लेना पाल।
सोच-समझकर बोलना, ऐ चंचल ‘वाचाल’।।
सही कथन का चयन ही, बन जाएगा ढाल।
ग़लत दिया उत्तर अगर, टुकड़े कर दूँ भाल।।
बोझ लदा है पीठ पर, मैं हो रहा निढ़ाल।
उत्तर भी दूंगा मगर, पहले करो सवाल।।
अर्थशास्त्री कौन वो, जिसने किया कमाल।
मैंने मनमोहन कहा, झट उड़ लटका डाल।।
पार पाना कठिन है मदद के बिना
जानता है सभी सर्वज्ञाता है तू
दास्तां क्या सुनाता ऐ मालिक तुझे
अपने कर्मों से ख़ुद ही परेशां रहा हाल क्या-क्या बताता ऐ मालिक तुझे
मैं भटकता रहा मंदिरों मस्जिदों मुझको पंड़ों फ़क़ीरों से कुछ न मिला
मैं परेशान था और पशेमान भी सारे झण्ड़ों लकीरों से कुछ न मिला
ना नज़र में तेरी पर मैं था बेख़बर कैसे पहचान पाता ऐ मालिक तुझे
ज़ोर मारा मुकद्दर ने दर पे तेरे आ गया कमनसीबी से पीछा छुटा
खा के ठोकर सम्हलना है अच्छा अगर फ़िर लुटूँ न जो अब तक लुटा सो लुटा
यूँ बना ही रहे मुझ पे तेरा करम सर ये अपना झुकाता ऐ मालिक तुझे
है लग्न तो मगर इक तड़प की कमी कैसी उलझन में हूँ मेरे मुश्किलकुशा
इस भँवर में फँसा छटपटाता हूँ मैं पार पाना कठिन है मदद के बिना
ऐ मेरे ना ख़ुदा पार कश्ती लगा वास्ता दे बुलाता ऐ मालिक तुझे
देशभक्त ऊधम सिंह सा
दोस्ती में दोस्तो ईमान मुझको चाहिए
शर्त इक ये भी है के इंसान मुझको चाहिए
मैं किसी दरबार का इक मसखरा चारण कहाँ
चन्द्र बरदाई हूँ मैं चौहान मुझको चाहिए
मतलबी दुनिया में फ़िर बेशक़ भरे हों मान सिंह
शक्ति सिंह जैसा भी इक नादान मुझको चाहिए
राजगुरु सुखदेव भगत आज़ाद सबके साथ में
बिस्मिल-ओ-अशफ़ाक़ जैसी शान मुझको चाहिए
ग़ैर मुल्कों में दिखाए जो ग़ज़ब मर्दानगी
देशभक्त ऊधम सिंह सा अभिमान मुझको चाहिए
सेदोका
रे बचपन
टूट-टूट बिखरा
बिखरा तो निखरा
अब ख़ुश हूँ
महका ये आँगन
धन्यवाद ज्ञापन
बचपन ने
ऐसी मारी ठोकर
बन गया जोकर
काम तमाम
है औरों के हाथ में
अब मेरी लगाम
बचपन से
लकवाग्रस्त हूँ मैं
लेकिन मस्त हूँ मैं
पैरालंपिक
सिद्ध हुआ आशीष
अब हूँ न्यायाधीश
अकुलाहट ( हाइकु )
अकुलाहट
कतर कर पर-
कहाँ गया तू
चोटिल पंख
अपार है गगन-
घर है दूर
देख रही हैं
तुम्हारी हरकत-
उसकी आँखें
क्या कर बैठा
नज़र बचा कर-
पछताता हूँ
ईमानदारी
मिर्च झौंकना आँख-
कब सीखोगे
आया एक फ़क़ीर
सड़क किनारे बैठा करती महिलाओं की भीर
किसने शौचालय बनवाए किसने समझी पीर
मोटी तौंदें चरा किए थीं आलू मटर पनीर
रोटी को जो तरसा करती उस थाली अब खीर
लरज-लरज कर तड़पा करता जिन पलकों पर नीर
आयुष्मान कार्ड़ से उनकी बदल रही तक़दीर
कंधे पर झोली लटकाए आया एक फ़क़ीर
देखो कैसे बदल रहा है भारत की तस्वीर
टाला न गया
मेरे ही अपने अपनों ने, जो दोष मढ़ा — टाला न गया।
रस्ते पर खोदा ढाँप दिया, इक बड़ा गढ़ा — टाला न गया।
जिस-जिस की इच्छा रही प्रबल, कोशिश की लेकिन नहीं मिला;
मैं जिससे भागा दूर-दूर, आ गले पड़ा — टाला न गया।
झूठा कपटी छलिया लम्पट, बदज़ुबां घमंड़ी बेग़ैरत;
सारा इल्जाम इकट्ठा हो, आ शीश चढ़ा –टाला न गया।
सब शर्तें अपनी थोप मुझे, पंचायत ने पाबंद किया;
उस मौके पर जो दिया गया, वो पढ़ा-लिखा –टाला न गया।
जाने अनजाने संस्कार , उद्घटित हुए अवसर पाकर;
कब तक सहता लो फूट गया, कर्मों का घड़ा –टाला न गया।
आलिंगन में लेकर
महाशून्य में विलय आत्मा का हो तो
इससे बढ़कर फ़िर कोई उपहार नहीं
भूमा सारी परतें तुरत हटा दे तो
कोटिश उपचारों से ये उपचार सही
अंगीकार करो मुझको हो मधुर मिलन
पल भर में प्राणों को अर्पित कर दूंगा
आलिंगन में लेकर कभी परीक्षा लो
स्वेद गंध को तुरत सुवासित कर दूंगा
सिर पर चाँदी मन में सोना लिए हुए
बजा रहा हूँ मगन प्रेम का इकतारा
जीवन की पगड़ण्ड़ी पर मैं खोज रहा
श्वासों के अभिमान अहं से छुटकारा
मुक्ति नहीं मोक्ष का दीजे आश्वासन
क्षणभंगुर तन मन उत्सर्जित कर दूंगा
आलिंगन में लेकर कभी परीक्षा लो
स्वेद गंध को तुरत सुवासित कर दूंगा
तू गाना मत गइयो
फिजा मनभावन मस्त और नम थी
बस में अपेक्षाकृत भीड़ बहुत कम थी
अगली खिड़की से एक मनचला चढ़ आया
ठीक सामने बैठी शांत युवती को देख
निहायत बेहूदगी से मुस्कुराया
कुछ अदाएँ बनाईं
और गुनगुनाया
दे दे प्यार दे प्यार दे प्यार दे रे हमें प्यार दे
युवती की भृकुटी तनी
मगर बात नहीं बनी
युवक की बेजा हरकत जारी थी
जाने क्या मनसा लाचारी थी
साथ वाली सीट पर बैठ मुस्कुराया
फ़िर वही गीत दोहराया
यात्री बैठे नहीं, जड़वत पड़े थे
आँख-कान खुले, मुँह पर ताले जड़े थे
अगले स्टाप पर बस ज्यों ही रुकी
युवती झटके से उठ उस नीच पर तनिक झुकी
आश्चर्य कि मजनू के गाल पर चार-छह झापड़ तड़ातड पड़े
कन्या ने क्रोध के आवेग में शब्द कहे कुछ कड़े
बोली– पिद्दी के शोरबे,हड़्ड़ियों के ढाँचे
प्यार लेगा, ले चार-छह और तमाचे
तभी कण्ड़क्टर ने पीछे से छेड़ी ऊँची तान
तू गाना मत गइयो, मत गइयो मेरी जान
फागुन की मस्त बयार संग
कलियों ने घूंघट पट खोले तो भँवरे गाएँ गुनगुनगुन
कोयल बुलबुल पण्ड़ुक तोते सब लगे सुनाने मीठी धुन
इस फगुनाई अँगड़ाई में तरुओं पर आई तरुणाई
सूनी शाखाएँ चहक रहीं नवकलिकाओं की बातें सुन
मेरा मनवा भी झूम उठा ज्यों वन में नाच उठे मतंग
तन को सहलाती मंद-मंद फागुन की मस्त बयार संग
पीले सरसों के खेत हुए जंगल में फूले हैं पलास
ये बूंद ओस की जमी हुईं आनंदित पुलकित हरी घास
आ रहीं बालियाँ गैहूँ में जौ चना मटर सब फूल रहे
कृषकों के चेहरे खिले-खिले लेकर के मन में नई आस
जब दूर टटिहरी बोल उठी तो ध्यान हमारा हुआ भंग
तन को सहलाती मंद-मंद फागुन की मस्त बयार संग
एकांत यहाँ पीपल नीचे है भोर सुहानी शांत घड़ी
कुछ देर बैठ यदि ईश्वर से चेतन मन की जुड़ जाए कड़ी
नैसर्गिक सुख भौतिक जीवन उच्छृंखल मानव रहता है
अब लगन तनिक उस ओर लगे जिस हेतु नींव मनुजात पड़ी
मैं हरी भजन में लीन रहूँ चन्दन से लिपटें ज्यों भुजंग
तन को सहलाती मंद-मंद फागुन की मस्त बयार संग
जिस्मानी रिश्तों में डूबा
कैसे ग़ज़ल सुहानी लिख दूँ
कविता गीत कहानी लिख दूँ
अस्मत लूट रहे बेटी की
क़ातिल हुई जवानी लिख दूँ
ग़लती बच्चों से हो जाती
कैसी ग़लत बयानी लिख दूँ
झूठ फरेब कपट छल वाली
नेता की नादानी लिख दूँ
जिस्मानी रिश्तों में डूबा
कैसे क्या रूहानी लिख दूँ
मर गई निर्मला छप्पर में
काटा छीला झटका पटका फ़िर ख़ूब निचोड़ा फैंक दिया;
पूछो गन्ने से मीठा होना भी कितना दुखदाई है।
आँखों में आँसू होंठों पर मुस्कान मंद भीगी-भीगी;
अम्मा होना आसान नहीं माँ धीरज की परछाईं है।
कोई तो बात रही होगी वो देखा किए कनखियों से;
इक इसी गिरह ने ही मेरी रातों की नींद उड़ाई है।
सूना-सूना सा ये मौसम सूने रस्ते सूनी गलियाँ;
हर शज़र यहाँ सूखा-सूखा तन्हाई ही तन्हाई है।
मर गई निर्मला छप्पर में कुछ दूत छीलते रहे उसे;
उसकी खातिर काहे रोना वह तो इक पीर पराई है।
अन्तड़ियाँ फुलवा दे
भर-भर बोरी धन पहुँचा दे मीत वही
मुझे आम से ख़ास बना दे मीत वही
बरसों से मैं भटक रहा हूँ बेगानों सा
जो भी कुर्सी तक पहुँचा दे मीत वही
तड़प-तड़प कर जान न दे दूँ तरस खाइए
फटा पजामा जो सिलवा दे मीत वही
हाथ-पैर तो हिला रहा हूँ फ़िर भी यारो
बिना परिश्रम फल चखवा दे मीत वही
सबके हिस्से का खा जाऊँ मिले वो मौक़ा
कुम्हली अन्तड़ियाँ फुलवा दे मीत वही
मन बैरी
कभी पराई पीर छीन लेना चाहे
कभी पराई बीर छीन लेना चाहे
चाहे कभी लुटाना दौलत दोनों हाथों
कभी पराई खीर छीन लेना चाहे
मन बैरी जाने क्या सोचे क्या-क्या चाहे
अभी कुलाँचें भरने अम्बर में जाए
कभी महासागर की तलछट ले आए
कभी काट लेता सिर अपने अपनों के
कभी पराई लाश संग मरघट जाए
मन बैरी जाने क्या सोचे क्या-क्या चाहे
इक पल संन्यासी बनने को ललचाए
दूजे पल व्यभिचारी होकर मुस्काए
कभी आस्तिक बनकर नतमस्तक होता
कभी नास्तिक होकर बुत को ठुकराए
मन बैरी जाने क्या सोचे क्या-क्या चाहे
भागम भागम रेलमपेल
गूढ़ फलसफा बनी हुई है
सम्बन्धों की रेल
जैसे लुका छिपी का खेल
खोजबीन में निचुड़ रहा है
हाड़-मांस का तेल
भागम भागम रेलमपेल
सच्चे-झूठे गोलमोल से
कर के तर्क-कुतर्क
जीवन बना लिया है नर्क
मेरी फूटी, उनकी फूटें
सब का बेड़ा ग़र्क
हमको क्या पड़ता है फ़र्क
अजब-गजब उद्घटित हो रहे
घटनाक्रम बेमेल
भागम भागम रेलमपेल
नहीं रहा सौहार्द तनिक भी
भृकुटि तन जाती है
फ़िर परस्पर ठन जाती है
इत्ती सी घटना ही लोगो
दुःख बन जाती है
राह वही पतन जाती है
परिवारों में गुत्थमगुत्था
रहे आफ़तें झेल
भागम भागम रेलमपेल
क्यों लूटी बारात
बिन बादल गत वर्ष हुई अंगारों की बरसात
काले-काले दिवस रहे तो सूनी-सूनी रात
नव कलिकाएँ झुलस गईं आमों के सँग जामुन की
हरे-भरे थे सूख गए सब अमलतास के पात
यलो बैल के पुष्प झड़ गए गुड़हल खड़े उदास
रूखा-सूखा दीन-हीन सा मौलसिरी का गात
पूरी रात चहक कर जो ख़ुशबू बाँटा करता था
मौसम की क्या मार पड़ी मुरझाया पारिजात
तोतई रँग था अमरूदों के पत्ते पड़ गए पीले
हरी-भरी थी महंदी वो भी पीली हुई बलात्
नीले-काले पके हुए फल सभी करी पत्ते के
सूख झड़ गए बहुत बुरे हैं सावन के हालात
अरुकेरिया मुँह लटकाए पूछ रहा नींबू से
बता सखे किसने अनार की क्यों लूटी बारात
चम्मच-चमचा-कड़छा
मैं चम्मच हूँ
दिन में कई बार श्रीजी की नर्म-नाज़ुक उँगलियों के स्पर्श का आनन्द मुझे प्राप्त होता है
मेरी पहुँच उनके मुँह तक है
यदि तनिक हिलूँ तो उनके मुँह का बाहर आ गिरे
मेरी बात वे प्रायः माना करते हैं
क्योंकि
मैं ही तो उनकी उदर पूर्ति का साधन हूँ
मैं चमचा हूँ
चम्मच का अस्तित्व मुझी पर निर्भर है
कि जो परोसता हूँ मैं उनकी प्याली में
चम्मच उसको उनके मुँह तक ले जाती है
निज अस्तित्व बचाए रखने की खातिर
मुझको ये सब करना पड़ता है, प्यारे
मैं कड़छा हूँ
बिन मेरे चमचे-चम्मच की कौन पूछता बात
सबसे निकट देगची के मैं ही रहता हूँ
वाष्पायन की गुप्त ऊष्मा झुलसा करती मुझको
मेरा दर्द न जाने कोय
किन्तु जो है सबसे दूर
चले उसकी सर्वाधिक
हे प्रभु मारो मंत्र, बनाओ मुझको चम्मच
झुलसने, जलना देख देगची के इस दुःख से
शीघ्र उभारो अन्तर्यामी, शीघ्र उभारो
क्या कुछ कहना चाहोगे
सम्बन्धों में ज़हर घुल रहा
रोज़ नया इक क़हर तुल रहा
क्या कुछ कहना चाहोगे
थोड़ा स्याह-सफैद रह गया
घर में होकर क़ैद रह गया
क्या कुछ कहना चाहोगे
धड़कन बढ़ती लगातार क्यों
हिम्मत टूटे बार-बार क्यों
क्या कुछ कहना चाहोगे
मार पड़ रही कोड़े जैसी
पीड़ा रिसते फोड़े जैसी
क्या कुछ कहना चाहोगे
कविता लिक्खूँ ग़ज़ल कहानी
जिस्मानी या फ़िर रूहानी
क्या कुछ कहना चाहोगे
उस घोटाले बिन क्या जीना
क्या कहने तेरी काबीना
कुछ आँखों वाले नाबीना
घुटनों में दम है नहीं मगर
चलते कैसे ताने सीना
जब देने की नौबत आए
माथे पे आए पसीना
लेने का अवसर आया तो
सबसे पहले बढ़कर छीना
पद की गरिमा ना तौंद भरे
पद का पर्दा झीना-झीना
बाहर साधु सा दिखते हैं
भीतर छुपकर गट-गट पीना
भर-भर कर बोरे जो लाए
उस घोटाले बिन क्या जीना
काँटा है
रिश्तों में दीवार नाम का काँटा है
पालन में व्यवहार नाम का काँटा है
चढ़ा हुआ उन्माद पवन के घोड़े पर
हाथों में तलवार नाम का काँटा है
माँझी नाव डुबाएगा मालूम न था
लिये हुए पतवार नाम का काँटा है
किस-किस का घर मूढ़ बचा पाएगा तू
हर घर ख़ुदमुख्तार नाम का काँटा है
तूफ़ानों से खेल रहा है क्यों ‘वाचाल’
सागर में भी ज्वार नाम का काँटा है
तुम ही तुम
इस मौसम बदले सावन में तुम ही तुम
मन के भीतरले आँगन में तुम ही तुम
तन तीरे तृष्णा तैरी तरुणाई में
अब मन के चंचल वाहन में तुम ही तुम
अस्त हुआ मटमैला सूरज फागुन में
तब से अब तक के आवन में तुम ही तुम
ध्यान धरूँ परमेश्वर का मन भटके है
साँसों के आवन-जावन में तुम ही तुम
मीठी पीर अगन में परिवर्तित सी है
तन के टीस रहे घावन में तुम ही तुम
डर कैसा जब साथ तुम्हारा रे मितवा
भीगे मनभावन कानन में तुम ही तुम
मंद-मंद गूँजे बंसी की स्वर लहरी
गोपी मन के वृंदावन में तुम ही तुम
उतरी आँगन में धूप
खिली-खिली है भोर सुहानी
खिला-खिला है दिन का रूप
रंग सुनहरा अरुणाई का
ले उतरी आँगन में धूप
कोयल कूके अमराई में
बुलबुल गाएँ गीत मधुर
जामुन की डाली पर बैठीं
पण्ड़ुक देखें टुकुर-टुकुर
तोते बोले अमलतास पर
और अशोक पर मैनाएँ
उधर नीम से छनकर आए
कौए का बेढ़ंगा सुर
गौरैया चहकें नींबू पर
कुछ भँवरे गुन-गुन रहे
शहतूतों के पत्ते सीं
टेलर पंछी घर बना रहे
श्याम चिरैया छज्जे नीचे
तिनका-तिनका जुटा रहीं
बन्दर के दो छोटे बच्चे
छत पर ऊधम मचा रहे
सबके मन को लुभा रहा है
कुदरत का ये रूप अनूप
रंग सुनहरा अरुणाई का
ले उतरी आँगन में धूप
शातिर
मैं भी शातिर तू भी शातिर
ये भी शातिर वो भी शातिर
नजमा सलमा अनिता शातिर
ग़ज़ल कहानी कविता शातिर
सच्चा शातिर खोटा शातिर
बेपैंदे का लोटा शातिर
कलयुग का प्रणेता शातिर
सतयुग द्वापर त्रेता शातिर
मुस्तकबिल-ओ-माज़ी शातिर
मुल्ला शातिर काजी शातिर
जनखा औरत मर्द भी शातिर
सुख वैभव दुख दर्द भी शातिर
गर्मी बारिश ठण्ड़ भी शातिर
लज्जा और घमण्ड़ भी शातिर
जनता शातिर नेता शातिर
क्रेता अरू विक्रेता शातिर
अल्ला शातिर मौला शातिर
ब्रम्हा विष्णु भोला शातिर
शातिर शातिर सारे शातिर
होशियार मतवारे शातिर
बारम्बार कहूँ मैं शातिर
तू है शातिर हूँ मैं शातिर
मिल कर सोचो घिर कर सोचो
उठ-उठ कर गिर-गिर कर सोचो
हैं सारे ही माहिर सोचो
कौन नहीं है शातिर सोचो
ढूंढ़ें आज मकान कहाँ
सहज मिले सामान कहाँ
जीना अब आसान कहाँ
धन-दौलत की दुनिया में
निर्धन का सम्मान कहाँ
अजब भोर की वेला है
फूलों पर मुस्कान कहाँ
धर्म धरा पर होता है
बतला लहूलुहान कहाँ
मृत का मुँह देखें रोएँ
जीवित पर है ध्यान कहाँ
पिता बेच दे बेटी को
ऐसा कन्यादान कहाँ
जानी पहचानी दुनिया
लोग हुए अनजान कहाँ
कंक्रीट के जंगल में
ढूंढ़ें आज मकान कहाँ
रहा किये ‘वाचाल’ बहुत
लुप्त हुई पहचान कहाँ
मीजान कहीं बिकता है क्या
अम्नो-अमान का सामान कहीं बिकता है क्या
छल झूठ कपट का भी ज्ञान कहीं बिकता है क्या
कुछ सीख लूँ उससे ज़रा जीने के उसूलात
इतना बताइये शैतान कहीं बिकता है क्या
मैं सोच रहा हूँ कि थोड़ा सा ख़रीद लाऊँ
कोई पढ़ा-लिखा विद्वान कहीं बिकता है क्या
इस तरबियत से आ चुका अजिज मेरे अदीब
मत ये सिखाइये ईमान कहीं बिकता है क्या
ये मनाजिर ये हवा ये रौशनी दीवानगी
दुनिया में इसका मीजान कहीं बिकता है क्या
अवतारों की तरह
चुभने लगा जाएँ जब अल्फाज़ ही खारों की तरह
हादिसे होने लगें आम बाज़रों की तरह
बिकने लग जाए जब ईमान अख़बारों की तरह
क़ातिल चोर उचक्के जब आ जाएँ सरकारों की तरह
आमजन जब रहे ख़ामोश हरकत में न आए
मुल्क का हाल जब हो जाए बीमारों की तरह
हर तरफ़ लूट मारामार का हो बोलबाला
सियासत का चलन हो जाए सितमगारों की तरह
ज़मीं जब दबने लगे बोझ से जुल्मो-क़हर के
धधकने जब लगे माहौल अंगारों की तरह
आदमी आदमी के ख़ून का प्यासा हो जब
नौंचने जब लगे इंसान सियारों की तरह
मददगारों की तरह डूबती कश्ती बचाने
तभी आते हैं कुछ मेहमान अवतारों की तरह
जीवन का प्रवाह अटल
ख़ुद से भी ये करता छल
मनवा भी कितना चंचल
जाना है इक दिन सबको
ना जाने की चाह प्रबल
साँसों के तारों में उलझा
बीत रहा सबका पल पल
क्रन्दन वन्दन अभिनन्दन में
मानव रहता उच्छृंखल
सम्बन्धों की महानदी में
घटनाओं का योग विरल
नैसर्गिक सौंदर्य लुभाए
दारुण दुःख कर रहा विकल
टूट-टूट कर जुड़ता रहता
जीवन का प्रवाह अटल
इस भँवर से जाऊँ निकल
सब भाँति विकास किया मेरा, किस जन्म का ये प्रतिफल भगवन्।
आभारी और कृतज्ञ हूँ मैं, उज्जवल है मेरा कल भगवान्।
ना गुण ना लक्षण ना क्षमता, नहीं धर्म-कर्म का ज्ञान मुझे;
प्रेयसी बनूँ कैसे तेरी, मेरी सब आस विफल भगवान्।
है लगन मिलन की लगी मुझे, दिन-रात और प्रतिपल प्रतिक्षण;
अब कृपा तनिक इतनी कीजे, हो जाऊँ और विकल भगवन्।
तेरा सानिध्य मिले मुझको, संवाद मिले रस स्वाद मिले;
आह्लाद मिले उन्माद मिले, इस भँवर से जाऊँ निकल भगवान्।
अभिभूत बहुत आनन्दित हूँ, संदेश प्रेम सम्प्रेषण से;
वर्षों से करती आई जो, उपवास मेरा निश्छल भगवान्।
मुस्कान विकट झटपट नटखट, उद्वेलित करती मन मेरा;
हो जाएँ दिव्य दर्शन स्वामी, अन्तस का खिले कमल भगवान्।
है कपट जलन जिनके मन में, सबके सब मेरे अरि हुए;
उसके उर प्रेमानंद भरे, मेरा उद्देश्य सफल भगवान्।
देखा उसने भी मुड़के कहाँ
क्या से क्या हो गई ज़िन्दगी
हादिसा हो गई ज़िन्दगी
इब्तिदा ठीक से न हुई
इन्तिहा हो गई ज़िन्दगी
इक करारी चपत क्या पड़ी
फलसफा हो गई ज़िन्दगी
आ न पाए अभी होश में
बेवफा हो गई ज़िन्दगी
हम अकेले खड़े रह गए
काफिला हो गई ज़िन्दगी
हौसलों ने दिखाए सराब
बुलबुला हो गई ज़िन्दगी
देखा उसने भी मुड़के कहाँ
अलविदा हो गई ज़िन्दगी
तन तहरीर
मन मतवारा तन तहरीर
दिल बेचारा हुआ फ़कीर
साँस हुए मेहमान प्राण के
खोया-खोया फिरे ज़मीर
चुस्त चलन है मस्त ख़याल
धुन दीवानी ख़्वाब अमीर
आँख-कान हैं सजग प्रहरी
ढुलमुल नीयत की तासीर
हाथ-पैर दमदार रियाया
ज़हन बादशा अहम वज़ीर
जीना हुआ मुहाल
बतलाऊँ क्या हाल दोस्तो
जीना हुआ मुहाल दोस्तो
रोजी-रोटी के चक्कर में
दिनचर्या भूचाल दोस्तो
अहर्निशि अब माप रहा हूँ
धरा गगन पाताल दोस्तो
ठाठ देखकर जनसेवक के
मन में उठे सवाल दोस्तो
कल तक जो था भूखा-नंगा
किस विधि मालामाल दोस्तो
धरने पर बैठे सहकर्मी
पीट रहे करताल दोस्तो
डब्बा पहुँचा प्रधान के घर
खत्म हुई हड़ताल दोस्तो
छोटा सा घोटाला कर के
घर बैठी दो साल दोस्तो
अधिकारी घर रुका रात तो
दिन में हुई बहाल दोस्तो
बादल बदल
बादल बदल तदबीर बदल
सपनों की तस्वीर बदल
बड़ी रुकावट बनी हुई
हाथ की वही लकीर बदल
अपनों ने जो दिये तुझे
उन घावों की पीर बदल
लरज-लरज जो तड़प रहा
पलकों का वो नीर बदल
निर्दोषों पर चला करे
तर्कश का वो तीर बदल
आसानी से पचे नहीं
थाली की वो खीर बदल
जीना करें मुहाल अगर
रिश्तों की ज़ंज़ीर बदल
पिता
पिता है तख़्ती, पिता क़ायदा
पिता कलम है, पिता दवात
पिता है कुदरत की सौगात
काठ का घोड़ा, पिता खिलौना
पिता बिछौना, पिता ही खाट
पिता मगर है बारहबाट
पिता रास्ता, पिता है कूचा
पिता मुहल्ला, पूरा गाँव
पिता महकती ठण्ड़ी छाँव
पिता किसान, खलिहान पिता है
सुख-सुविधा की खान पिता है
सम्बन्धों की जान पिता है
पिता ही आँगन, पिता ही घर
पिता द्वार और पिता किवाड़
पिता बिना सब सून-उजाड़
मन की पीड़ा
मन की पीड़ा से जब काँपीं, उँगली तो ये शब्द निचोड़े।
अक्षर-अक्षर दर्द भरा हो, तो प्रस्फुटन कहाँ पर होगा।
अभिशापों के शब्दबाण, लेकर दुर्वासा खड़े हुए हैं।
कैसे कह दूँ शकुन्तला का, फ़िर अनुकरण कहाँ पर होगा।
नया रूप धर धोबी आए, मन में मैल आज भी उनके।
ईश्वर ही जाने सीता का, नव अवतरण कहाँ पर होगा।
गली-गली फिरते दु: शासन, भीष्म झुकाए सिर बैठे हैं।
रजस्वला उन द्रौपदियों का, आँचल हरण कहाँ पर होगा।
मीठी चुभन कुटिल कुल्टा सी, नौंच रही तन के घावों को।
नमक छिड़कने हाथ आ गए, सद्आचरण कहाँ पर होगा।
वह कोमल कलिका कचनारी, मैं धतूर का फूल कसैला।
वह बगिया में इठलाएगी, मेरा खिलन कहाँ पर होगा।
झंझावात
तन में मन में झंझावात
है जीवन में झंझावात
जो इससे मुक्ति दिलवाए
उस अर्पण में झंझावात
ईश भजन में झंझावात
तड़प लगन में झंझावात
तर्क बड़े अनुभव हैं बौने
भौंड़ेपन में झंझावात
गोवर्धन में झंझावात
है निधिवन में झंझावात
बजी बाँसुरी जब कान्हा की
तो नर्तन में झंझावात
प्रेम अगन में झंझावात
शूल चुभन में झंझावात
वर्षों के उपरांत हुआ जो
मधुर मिलन में झंझावात
था ठिठुरन में झंझावात
जेठ तपन में झंझावात
बरसहिं जलद भूमि नियराए
अब सावन में झंझावात
वो बचपन में झंझावात
फ़िर यौवन में झंझावात
गोरे-गोरे गालों पर तिल
अल्हड़पन में झंझावात
खोज दुल्हन में झंझावात
पति वरण में झंझावात
जब दहेज़ की भेंट चढ़े तो
घर-आँगन में झंझावात
है लेखन में झंझावात
सत्य कथन में झंझावात
उल्टा-सीधा सहे लेखनी
अन्तर्मन में झंझावात
टका सा
बचा माल असबाब टका सा
ख़ाना हुआ ख़राब टका सा
बाहर वालों से तो जीते
घर में नहीं रुआब टका सा
बच्चे खड़े हुए पैरों पर
देने लगे जवाब टका सा
कभी चाँद सा दमका करते
आज नहीं है ताब टका सा
लाख-करोड़ों के मेले में
बिका हमारा ख़्वाब टका सा
सब क़िस्मत का खेल रह गया
ये हीरा नायाब टका सा
रहा किया ‘वाचाल’ हमेशा
हट के रहा नक़ाब टका सा
साहित्यिक संसार मुझे
व्याकुलता क्रंदन बन्धन से आए चैन करार मुझे
दे असीम प्रेम अपना या इत्ती सी तकरार मुझे
मैं लिखता जो अक्षर सीधे, टेढ़े-मेढ़े हो जाते
तेरी घुंघराली अलकों का ऐसा चढ़ा ख़ुमार मुझे
चकाचौंध आँखें हो जाएँ जिसकी स्वर्णिम आभा से
उसके हिस्से का थोड़ा सा मिल जाए भण्ड़ार मुझे
विपुल सम्पदा नहीं चाहिए वो तो आनी-जानी है
विप्र सुदामा का सा जीवन किस विधि मिले उधार मुझे
बजा मुरलिया हे गिरिधारी सुध-बुध खो जाए मेरी
लय मेरा तुझमें हो जाए दे दे ये उपहार मुझे
चकित-चकित सी भीड़ खड़ी हो भारी यमुना के तीरे
उचक-उचक कर सारे देखें करते नदिया पार मुझे
जड़-जंगम कल्याण के हित में सृजन करूँ माँ सरस्वती
दशकों-सदियों याद करे फ़िर साहित्यिक संसार मुझे
रोगों से कर मुक्त मुझे और भोगों से छुटकारा दे
सर्व हितैषी महा चिकित्सक दे ऐसा उपचार मुझे
फटी चादर को ओढ़ कर साहब
फटी चादर को ओढ़ कर साहब
ग़म की बाहें मरोड़ कर साहब
आइये नेक काम ये कर लें
दिल के रिश्तों को जोड़ कर साहब
मैंने मौजों से लिया है पंगा
अपनी कश्ती को छोड़ कर साहब
आशियाने बचाए हैं अक्सर
रुख़ हवाओं का मोड़ कर साहब
बड़प्पन क्या दिखा रहे हैं आप
नाक-भौंह को सिकोड़ कर साहब
लहू इससे टपकता तो नहीं
दिखाओ दामन निचोड़ कर साहब
भला क्या साथ लेके जाओगे
हज़ारों को करोड़ कर साहब
मैंने लिक्खी इक ग़ज़ल
मैंने लिक्खी इक ग़ज़ल, वे बोलीं तत्काल।
हम पर भी कुछ तो लिखो, सिरीमान वाचाल ।।
उनकी खिदमत में पढ़ा, जब मैंने इक शे’र।
झल्ला कर चिल्ला पड़ीं, तुझे उठा ले काल।।
झट मैंने इक तीर से, दो-दो किये शिकार।
भर मुट्ठी में मल दिया, अबीर उनके गाल।।
द्वार खड़े उनके बलम, बोले जोड़े हाथ।
राघव तुमने कर दिया, कैसे बड़ा कमाल।।
अपनी शादी को हुए, बीते दसियों साल।
हमसे लगवाया नहीं, इसने कभी गुलाल।।
तुम्हारी जय हो रघुवंशी।
अटल निश्चय हो रघुवंशी।।
नीलकमल
उनकी आँखों ने लिखी एक ग़ज़ल
झील में खिल उठा है नीलकमल
उनका अंदाज़ यूँ हावी मुझपे
दिल के बालू में हुई उथल-पुथल
बहारें लौट खिजां में आईं
झौंपड़ी को मिला है शीशमहल
मैं भी कर के ज़रा देखूँ कोशिश
कामयाबी मिलेगी आज न कल
बजें शहनाइयाँ मेरे आँगन
मुद्दतों बाद लौटे चहल-पहल
ईर्ष्या
कल-कल बहती नदिया तीरे
ठण्ड़े जल के बहुत निकट
वृक्षों के गहरे झुरमुट में
लम्बी-लम्बी शाखाओं पर
बड़े जतन और परिश्रम से
तिनका-तिनका चुन-चुन कर
उत्साहित से बया समूह ने
सुन्दर सुघड़ घरौंदों का
निर्माण किया
वंशवृद्धि के हेतु
सजाए अण्डे उनमें
एक प्रातः जब निकला सूरज
हर्षित होकर बया झुण्ड़ ने
गाए गीत मधुर मनभावन
बन्दर के इक बड़े टोल को
ना जाने क्यों लगा अपावन
टूट पड़े नक्सलियों जैसे
डाली-डाली पर वे क्रूर
तार-तार हो गये घरौंदे
अरू अण्ड़े भी चकनाचूर
बेचारी निर्दोष बया के
बिखर गये सारे अरमान
लाचारी में भय आतुर हो
भागीं तुरत बचाकर जान
सराब रखता हूँ
कई चेहरे जनाब रखता हूँ
हरेक पर नक़ाब रखता हूँ
सवालों के जवाब हैं लेकिन
गुल्लकों में जवाब रखता हूँ
किसिम किसिम की हैं रातें मेरी
बीसियों माहताब रखता हूँ
बूढ़े माता-पिता के हिस्से की
हर दवा का हिसाब रखता हूँ
बीवी-बच्चों के नाम से बेशक़
बैंकों की किताब रखता हूँ
घर में आ जाए जब कभी साली
उसके खातिर गुलाब रखता हूँ
भाई-भाभी कभी आ जाएं इधर
ख़िदमात में सराब रखता हूँ
सराब— मृग मरीचिका
सब कुछ लुटा गँवा बैठे
सब कुछ लुटा गँवा बैठे, फ़िर भी सन्तुष्ट नहीं अपने।
पिघल-पिघल अदृश्य हो गए, हमने जो देखे सपने।
अपनी प्यारी सूरत में, जो अक्स देखते थे मेरा।
थोड़ा सुख क्या उधर मिला, गैरों का नाम लगे जपने।
गहराई में क्या जाना, उथले पानी में देख लिया।
टूट-बिखरते सम्बन्धों के, अब विश्वास लगे तपने।
इक्का-दुक्का कहा-सुनी का, कहाँ पता चल पाता था।
अब छोटी-छोटी बातों के, इश्तिहार लगे छपने।
ऊपर वाले का खेला, तू क्यों अफ़सोस करे ‘वाचाल’।
उनका कहीं इलाज़ नहीं, जो निकल पड़े मरने-खपने।
फागुन की मस्त बयार
कलियाँ घूंघट पट खोलेंगी
भँवरे गाएंगे गुन गुन गुन
कोयल बुलबुल पंड़ुक तोते
सब लगें सुनाने मीठी धुन
मेरा मनवा भी झूमेगा
जब नाचेंगे वन में मतंग
तन को सहलाती मंद-मंद
फागुन की मस्त बयार संग
मैं भी देखूँ
इन ज़ुल्फ़ों को यार झटक कर मैं भी देखूँ
सूली पे इस बार लटक कर मैं भी देखूँ
देखूँ कैसा होता है काँटों का चुभना
कांटों में इक बार अटक कर मैं भी देखूँ
अब तक नाचा नहीं झूम कर किसी साज़ पे
थोड़ा सा इस बार मटक कर मैं भी देखूँ
अंधे हाथ बटेर लग गई मैं पछताऊँ
दरवाज़ा कुछ बार खटक कर मैं भी देखूँ
नशा इश्क़ कैसा देता है ये भी जानूँ
मय के प्याले चार गटक कर मैं भी देखूँ
क्या कहने
तेरे-मेरे मेरे- तेरे सम्बन्धों के क्या कहने
इक-दूजे पर थोपे जो भी प्रतिबन्धों के क्या कहने
मजबूरी में कैसे-कैसे रिश्ते-नाते झेल रहे
आपस ही में पाले जो भी उन द्वंदों के क्या कहने
शाम-सुबह दिन-रात कभी भी वे पुर्ज़े दिखला देते
पंचायत ने जो लिखवाए अनुबन्धों के क्या कहने
उकसावे में आकर उनके हम भी आपा खो देते
ताक रहे जो बगुले जैसे जयचन्दों के क्या कहने
अपनापन दिखलाते जबकि मन में मैल घुला उनके
मीठा-मीठा बोलें ऐसे फरजन्दों के क्या कहने
बाहर दलिया चाट रहे घर का हलवा बेस्वाद लगे
पर नारी में खोज रहे हैं मकरन्दों के क्या कहने
ऐ मूरख ‘वाचाल’ कभी भी मौन नहीं अपना लेना
प्याली में भर-भर गटकेग गुलकन्दों के क्या कहने
आओ मिलकर तोड़ें टंगड़ी
स्वघोषित D. Lit ‘वाचाल’
Literature की kit ‘वाचाल’
राजनीति के बड़े frame में
रह जाता unfit ‘वाचाल’
कविता गीत लिखे कोई पर
लेता benefit ‘वाचाल’
तक़लीफ़ों में भी मुस्काए
ये कैसी habit ‘वाचाल’
अच्छे काम करे कोई भी
ले जाए credit ‘वाचाल’
साथ निभाने वाले को ही
देता है merit ‘वाचाल’
रोड़ा कोई अगर बनेगा
तो खोदेगा pit ‘वाचाल’
Whisper मच्छर या हो मक्खी
सब की खातिर HIT ‘वाचाल’
घटिया ग़ज़ल रुबाई फ़िर भी
करता है submit ‘वाचाल’
अपनी पकड़ पहुँच ताकत से
हो जाता है hit ‘वाचाल’
आओ मिलकर तोड़ें टंगड़ी
हो जाए unfit ‘वाचाल’
छैला बाबू
छैला बाबू अफलातुन्न रहता ख़ुद में सदा मगुन्न
रँग कर रखता लाल-गुलाबी छोटी उंगलिन के नाखुन्न
लम्बी घुंघराली सी जुल्फ़ें हल्की-हल्की दाढ़ी
ऐंठा-ऐंठा उड़ता फिरता लेकर छकड़ा गाड़ी
लांड़ा कुर्ता तँग पतलुन्न आधा फागुन आधा जुन्न
इत्र फुलेल लगा कर मुन्ना नक़ली ख़ुशबू बाँटे
अधोवायु के समय-समय पर करता ख़ूब धमाके
खाए गुटखा पान मलंग करता कभी नहीं दातुन्न
इधर-उधर मंडराता रहता यहाँ-वहाँ मुँह मारे
आंदोलन जीवी का चलता घरवा इसी सहारे
जब ज़हर उगल ना देता इसको मिलता कहाँ सुकुन्न
इसलिये
दर्दे-दिल दर्दे-जिगर का किस तरीक़े हो बयां
क्या हसीं खाया है धोखा तू कहाँ और मैं कहाँ
तूने तख़्ती पर लिखी खुर्ची इबारत इस तरह
मेरे दिल पर आज भी क़ायम खरोंचों के निशां
मैं तो मैं ही हूँ मगर वो और भी दिलदार होगा
इसलिये तेरे वो सारे ख़त तुझे लौटा दिये
मुझसे ज़्यादा कोई तुझको और करता प्यार होगा
लिख लिया करती थी मेरा नाम अपने हाथ पर
और इशारा आँख से करती के मैं देखूँ उधर
फ़िर अचानक क्या हुआ ये सोच कर हैरान हूँ
क्या मिला तुझ को मेरे ज़ख़्मों के टांके काट कर
ये मरीज़े-इश्क़ कितना और यूँ लाचार होगा
इसलिये तेरे वो सारे ख़त तुझे लौटा दिये
मुझ से ज़्यादा कोई तुझको और करता प्यार होगा
पर ‘उस’ से कोई
कोई पूत कोई दौलत मांगे
कोई रुतबा और शौहरत मांगे
कोई दुनिया से न्यारी प्यारी
बेहद हसीन औरत मांगे
कोई राजपाट का इच्छुक है
कोई ठाट-बाट का इच्छुक है
कोई मस्त मसनदों गद्दों में
कोई एक खाट का इच्छुक है
कोई आशिक़ मस्त बहारों का
कोई आशिक़ चाँद-सितारों का
कोई मगन फ़क़ीरी में रहता
कोई आशिक़ है भण्ड़ारों का
पर ‘उस’ से कोई कहता ही नहीं
बस एक मुझे तू मिल जाए
हो जनम-मरण से छुटकारा
मेरा लय तुझमें हो जाए
राजनीतिक व्यंग्य
वोट मांगते वक़्त कभी बेशक़ हमने जूते चाटने
अब उन से क्या लेना-देना हमने सब रिश्ते पाटे
चाहे वोटर गाली दें या हाथ ख़ुदारा मला करें
हम कुर्सी से चिपक गए हैं जलने वाले जला करें
लोगों ने विश्वास किया जो उन्हें बनाया प्रतिनिधि
लेकिन वे सब-कुछ भूले और लगे खोजने नयी विधि
कुर्सी से चिपके रहने की जो आख़िर जानी थी छिन
सुनते हैं अब रो-रो गाते जाने कहाँ गए वो दिन
कुर्सी ढिंग पहुँचे मंत्री जी शीश झुका परनाम किया
बोले तुझे जीतकर हमने जग में अपना नाम किया
इतना कह कर नेताजी ने अपनी मूँछ मरोड़ी
सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी
अपदस्थ मंत्री जी तन्हाइयों में रो कर
मजबूरियों पे अपनी अत्यंत क्षुब्ध होकर
आहत स्वर में बोले कुर्सी मुझे बता दे
वो दिल कहाँ से लाऊँ तेरी याद जो भुला दे

देशपाल सिंह राघव ‘वाचाल’
गुरुग्राम महानगर
हरियाणा
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