दुनिया | Poem on Duniya

दुनिया

( Duniya )

 

है  कितनी  आभासी  दुनिया,

कुछ ताजी कुछ बासी दुनिया।

 

किसी की खातिर बहुत बड़ी है,

मेरे  लिए   जरा  सी  दुनिया।

 

युगों-युगों  से  परिवर्तित है,

फिर भी है अविनाशी दुनिया।

 

चमक  दमक के पीछे भागे,

हैं दौलत की प्यासी दुनिया।

 

सबको शिकायत है दुनिया से,

फिर भी काबा-काशी दुनिया।

 

कहीं  रौनकें, खुशहाली है,

कहीं दर्द की दासी दुनिया।

 

हमने इसकी शक्ल बिगाड़ी,

थी जो अच्छी खासी दुनिया।

 

संस्कार को भूलके अब तो,

भोगी बनी विलासी दुनिया।

 

कवि बिनोद बेगाना

जमशेदपुर, झारखंड

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