Faraz ki Ghazal

ह़ासिल मुक़ाम करना है | Faraz ki Ghazal

ह़ासिल मुक़ाम करना है

( Hasil muqam karna hai ) 

 

करें वो जो भी उन्हें काम धाम करना है।
हमें तो सिर्फ़ मुह़ब्बत को आ़म करना है।

अभी जो आग लगाकर गए हैं इस दिल में।
कहाँ हैं ढूँढिए उन को सलाम करना है।

जमाले यार को लफ़्ज़ों में ढाल कर रखना।
हमें तो काम यही सुब्हो शाम करना है।

सबब न पूछिए वाइ़ज़ यूँ हँस के पीने का।
किसी की शर्त है हँसकर कलाम करना है।

हम उनके हाथ की कटपुतली तो नहीं यारो।
जहां वो कह दें वहीं पर क़याम करना है।

वो काम चोर हैं जो चापलूसी करते हैं।
हमें तो काम से मतलब है काम करना है।

फ़राज़ साथ दिया वक़्त ने तो हमको भी।
जहां में कोई तो ह़ासिल मुक़ाम करना है।

 

शायर: सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़
मुरादाबाद ( उ0 प्र0 )
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