ग़र ना होती मातृभाषा

ग़र ना होती मातृभाषा | Matribhasha Diwas Par Kavita

ग़र ना होती मातृभाषा

( Gar na hoti matribhasha ) 

 

 

सोचो    सब-कुछ    कैसा  होता,

ग़र     ना     होती   मातृभाषा ।।

 

सब     अज्ञानी    होकर    जीते

जग-जीवन     का   बौझा  ढोते,

किसी  विषय  को   पढ पाने की

कैसे   पूरी    होती  अभिलाषा।।

 

कैसे    अपना     ग़म    बतलाते

कैसे    गीत     खुशी    के   गाते,

दिल  की  दिल  में ही  रह जाती

जीवन   होता    भरा   हताशा।।

 

खो    जाता  सब  लोक-साहित्य

जीवन   में    संस्कार   ना   होते,

सत्य   अहिंसा    और   धर्म  की

ना     होती    कोई    परिभाषा।।

 

सभ्य    कभी    नहीं   बन   पाते

जंगली-जाति      के     कहलाते,

ज्ञान-विज्ञान  “कुमार”  सब होता

आदिम-युग   का   बासा-बासा।।

 

?

लेखक: मुनीश कुमार “कुमार”
(हिंदी लैक्चरर )
GSS School ढाठरथ
जींद (हरियाणा)

यह भी पढ़ें : 

हिन्दी मे कुछ बात है | Short Poem on Hindi Diwas

v

Similar Posts

  • अवशेषी पुस्तिका | Avsheshi Pustika

    अवशेषी पुस्तिका ( Avsheshi Pustika )   ना सारांश ना ही उद्धरण; ना प्रतिमान ना ही प्रतिच्छाया छोटी सी स्मृति भरी अशुद्ध संवेदी अवधारणा हूँ… अप्रचलित परिच्छेदों; त्रुटियों से पूर्ण परित्यक्ता कही जाने वाली अधुरी सी गूढ़ कहानी हूँ… मेरे घटिया शब्दों के प्रत्युत्तर में तुम्हारी सभ्य खामोशी के अर्थ ढूँढने की कोशिश करती सस्ती…

  • विकास और बाजार | Vikas aur Bazaar

    विकास और बाजार  ( Vikas aur bazaar )    हमने मान लिया इंसान को भगवान और भगवान को पत्थर, पत्थर को रख कर लगा दिया बाजार और फिर शुरू हुआ विकास का क्रम, जमीने बिकने लगी औकात को देख कर लोग होने लगे बेघर सड़के चौड़ी होना शुरू हुई पेड़ कटने लगे उखड़ने लगे जड़…

  • कह दो ये | Poem keh do ye

    कह दो ये ( Keh do ye )   दूर के ढोल ,सुहाने अच्छे लगते है। दिल आये तो,बेगाने अच्छे लगते है॥   हंसते हंसते जो फांसी पर झूल गया हमको वो,दीवाने अच्छे लगते है॥   शम्मा को भी पता है,वो जल जाएगा उसको पर,परवाने अच्छे लगते है॥   अपनों से धोखे इतने खाये है…

  • आधार | Aadhaar

    आधार ( Aadhaar )    मिले हुए संस्कार ही करते हैं वैचारिक सृजन सोच मे संगत का प्रभाव भी संभावित है किंतु ,यदि पृष्ठभूमि भी सुदृढ़ हो तो बारिश की बूंदें गिरकर भी बह जाती हैं जीवन की नींव मजबूत होनी चाहिए तात्कालिक हवाएं डालियों को झुका भले दें दरख़्त को उखाड़ पाना सम्भव नही…

  • मेहनत से ही सुख मिलता है | Mehnat Se hi Sukh Milta hai

    मेहनत से ही सुख मिलता है ( Mehnat se hi sukh milta hai )    हांथ पे हांथ रखकर बैठने से मंजिले नही मिला करती। छूना है आसमां अगर तुमको उड़ान तो भरनी होगी जीवन में कुछ करना है तो, तो तुमको आगे बढ़ना होगा। छोड़ के सारी सुख सुविधाएं, कठिन राह को चुनना होगा।…

  • नदिया | Kavita Nadiya

    नदिया ( Nadiya )   नदिया बही जा रही धीरे धीरे दरिया की ओर बढ़ी जा रही धीरे धीरे लगी है भीड़ नहाने की देखो कोई डूब रहा कोई डूबा रहा देखो चली ये कैसी हवा धीरे धीरे जहर हि दवा बनी धीरे धीरे बचना नहीं है किसी को नदी से चली आ रही हकीकत…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *