Kavita Jal ki Mahtta

जल की महत्ता | Kavita Jal ki Mahtta

जल की महत्ता

( Jal ki Mahtta )

पशु पक्षी पेंड़ और मानव,
जितने प्राणी हैं थल पर,
जल ही है सबका जीवन,
सब आश्रित हैं जल पर,

जल बिन कहीं नहीं है जीवन,
चाहे कोई भी ग्रह हो,
जल बॅचे तो बॅचे सब जीवन,
इसलिए ही जल का संग्रह हो,

जल से ही हरियाली आती,
उगते वृक्ष पुरवाई चलती,
वाष्प रूप जल पीते बादल,
फिर धरती पर बरसाते जल।

Abha Gupta

आभा गुप्ता
इंदौर (म. प्र.)

यह भी पढ़ें :-

खाद्य सुरक्षा जागरुकता

Similar Posts

  • नेह की कोमलता | Kavita Neh ki Komalta

    नेह की कोमलता ( Neh ki komalta )   नेह ने कोमल बनाकर,वेदना को चुन लिया है, चाह में हिय ने विकल हो,कामना को बुन लिया है। भावना की धार अविरल, गुनगुनाती बह रही है, प्रीति की अनुपम धरोहर, मीत से कुछ कह रही है। आज यादों के झरोखे, अनमने से खुल रहें हैं, शांत…

  • मेरी प्रार्थना | Meri Prarthana

    प्रार्थना ( Prarthana )    पर्वत  घाटी  ऋतु  वसंत  में नभ थल जल में दिग्दिगंत में भक्ति  भाव  और अंतर्मन में सदा  निरंतर  आदि  अंत  में             युगों युगों तक तुम्हीं अजेय हो,           कण-कण में ही  तुम्हीं बसे हो।   सृष्टि  दृष्टि  हर  दिव्य  गुणों में स्वर  अक्षर  हर  शब्द धुनों में हम …

  • ग्रहों का कुंभ

    ग्रहों का कुंभ नीलाभित नभ में लगा, कुंभ ग्रहों का मीत।रूप राशि शशि को पुलक शुक्र निहारे रीत।। दिनकर हँस स्वागत करे, उषा रश्मि शुभ स्नान।सिंहासन आसीन गुरु, पा श्रद्धा-सम्मान।। राई-नौन लिए शनि, नजर उतारे मौन।बुध सतर्क हो खोजता, राहु-केतु हैं कौन? मंगल थानेदार ने, दिया अमंगल रोक।जन-गण जमघट सितारे, पूज रहे आलोक।। हर्षल को…

  • कब बरसी सवनवाँ | कजरी

    कब बरसी सवनवाँ टप-टप चुवेला पसीनवाँ, हाय, कब बरसी सवनवाँ। लुहिया के चलले से सूखेला कजरवा, ऊपरा से नीचवाँ कब बरसी बदरवा। गरमी से आवें न पजरवाँ, हाय, कब बरसी सवनवाँ। टप-टप चुवेला पसीनवाँ, हाय, कब बरसी सवनवाँ। ताल-तलइया,नदिया,पोखरी सुखैलीं, अपने बलम के हम गोनरी सुतऊलीं। चिरई जुड़ाई कब खोंतनवाँ, हाय, कब बरसी सवनवाँ। टप-टप…

  • सोलह श्रृंगार | Kavita Solah Shringar

    सोलह श्रृंगार ( Solah Shringar ) मैं तो सुहाग सिंदूर मांग सजाऊँ, मैं तो कंगन ,चूड़ी खन – खन खनकाऊँ, मैं तो पायलियाँ छन – छन छनकाऊँ , होता नहीं भाग्य में लिखा सबका सोलह श्रृंगार, चाहिए इसके लिए प्रभु जी की कृपा अपार। मैं तो मेंहदी हाथ रचाऊँ, मैं तो महावर पांव लगाऊँ, काजल…

  • जीने के लिए | Kavita jeene ke liye

    जीने के लिए  ( Jeene ke liye )    कक्षा में बिल्कुल पीछे पिछले सीट पर मैला कुचैला निराश उदास बैठा सबसे दूर, न कापी न कलम न पढ़ने का मन, मैंने डांटा धमकाया पर दबा दबा सा मुझे देखा देखता रहा अंततः कुछ न बोला, फिर प्यार से स्नेह और दुलार से पूछा, उसने…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *