जीवन-भाग-2

जीवन-भाग-2

हारना कब जितना
कब मौन रखना कब
बोलना कब संतुलित
होंना कब विनम्रतापूर्वक
पेश आना आदि – आदि
तब कहि जाकर हम
इस जीवन रूपी नोका
को पार् पहुँचाने की
कोशिश कर सकते है
अतः हमनें आवेश में
अपने आप को सम
नही रखा और अनियंत्रित
होकर बिना सोचें आक्रमक
होकर कुछ गलत सब्दों
का प्रयोग कर दिया तो
इस जीवन रूपी नोका को
टूटने से वह डूबने से कोई
भी नही बचा सकता है
विवेक जीवन का नमक है
और कल्पना उसकी मिठास
एक जीवन को सुरक्षित रखता है
और दूसरा उसको मधुर बनाता है
जीवन को सही से अच्छा
बना मानव भव का सार
निकाल मोक्ष को प्राप्त
हम करे यही हमारे
लिए काम्य है ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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