जीवन-भाग-1

जीवन-भाग-1

हम अपने जीवन में
चले जा रहें है कोई
दौड़े जा रहे तो कोई
दिशाहीन से भटक रहे है
आखिर हम सब जा
कहां रहे हैं? मंज़िल की
तलाश है राह दिखती नहीं
राह तो है पर मंजिल
निश्चित नहीं राह और
मंज़िल दोनों है पर गति नहीं
आखिर क्या करे ?
कैसी ये पहेली है कि
जीवन जीते सब हैं
पर विरले ही जीवन
अपना सार्थक जीते हैं
जिंदा तो दीखते है पर
बेज़ान से नज़र आते है
जबकि हमारा यह
जीवन हैं एक नोका
जब हम प्रसन्न होतें हैं
तो मन ही मन भावों
से सही से गुनगुनाने
लगतें हैं लेकिन यह
अनुभव हम अपना
स्वयं ही सही से
जान पाते हैं अतः हमें
कब किस के सामने

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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