Kahani Asamanjas

असमंजस | Kahani Asamanjas

सुधांशु बहुत उधेड़बुन में है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें? क्या ना करें ? सोचते हुए आज धीरे-धीरे एक मां हो गए। जब वह मां की 13वीं से लौट रहा था तो उसके पिताजी बहुत मायूस लग रहें थे। वह दूर जाते हुए अपने बेटे बहु को अपलक देखते रहे।

सुधांशु जब से घर से आया था बस पिताजी का चेहरा उसके सामने नाचता रहता है कि आखिर पिताजी कैसे होंगे ? वह सोचता अब पिताजी एकदम अकेले पड़ गए हैं ? पहले तो मां थी किसी प्रकार से जीवन गुजर जा रहा था लेकिन अब तो वह एकदम अकेले पड़ गए हैं ।

फिर उसके मन में विचार आता कि इतनी अच्छी जॉब है आखिर जाब लोगों को मिलती कहां है । यदि चाहे तो बाबू की सेवा के लिए दो चार नौकर और रख सकते हैं।

फिर वह सोचता -” क्या नौकर वैसे सेवा कर पाएंगे , जैसे बच्चे अपने पिता की करनी चाहिए नहीं ना ! ” आखिर वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करना चाहिए? एक तरफ है सुंदर जाब ठाट -बाट शहरों की रंगीन दुनिया , दूसरी तरफ पिताजी की सेवा। दोनों हो नहीं सकता है कारण यह भी था कि पिताजी यहां आने को किसी भी सूरत में तैयार नहीं होंगे।
वैसे उनके दो बच्चे हैं ।

दोनों बड़े हो गए हैं और हॉस्टल में रहते हैं। इसलिए बच्चों की तरफ से ज्यादा टेंशन नहीं बस टेंशन थी नौकरी की और दूसरी तरफ टेंशन थी पत्नी मालती की। क्या वह गांव में रहने को तैयार होगी?
इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि वह पत्नी एवं बच्चों के साथ लंबे समय तक शहर में रह रहा था। जिसके कारण पत्नी का मन भी शहर की चकाचौंध में ज्यादा लगता था।

उसने अपनी पत्नी से कहा-” कुछ दिनों से मेरा मन लग नहीं रहा है । जब से घर से आया हूं बाबू का चेहरा ही सामने नाच रहा है समझ में नहीं आ रहा है क्या किया जाए।”
उनकी पत्नी ने कहा -“क्या करना है नौकर लोग तो हैं । और एक आध रख दो बीच-बीच में देखने चलते रहेंगे और क्या?”

पत्नी की बात सुनकर उन्हें बहुत धक्का सा लगा। उन्हें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनकी पत्नी ऐसा कहेगी । यदि उसके पिता के साथ ऐसा होता तो वह भी अपने भाइयों से ऐसा करने के लिए कहती।

फिर उन्होंने कहा-” मैं तो सोच रहा था कि नौकरी से त्यागपत्र दे दिया जाए और घर चलकर बाबू की सेवा की जाए। अम्मा के न रहने पर बाबू अकेले पड़ गए हैं। आखिर बाबू ने जीवन भर किसके लिए कमाया हमारे लिए ही ना। फिर एक दिन अम्मा की तरह बाबू भी चले जाएंगे तब पछतावा होगा कि हम उनके लिए कुछ ना कर सके।”

पत्नी भी सोच में पड़ गई । बात तो ठीक है। सासू मां के न रहने पर ससुर जी अकेले पड़ गए हैं परंतु उसका मन फिर भी सुधांशु का जाब छोड़ना अच्छा नहीं लग रहा था।

लेकिन सुधांशु ने पक्का मन बना लिया था। बात दरअसल यह थी कि वह अपने घर में अकेला लड़का है । उसकी चार बहने थी । सभी की शादी विवाह हो चुके हैं। माता-पिता की सेवा के लिए भी पहले उसने अपने क्षेत्र में ही रह कर नौकरी करता रहा बाद में उसका ट्रांसफर हो गया।

जब तक मां थी तो किसी प्रकार जीवन कट जा रहा था । सबसे बड़ी बांधा यह भी थी कि उसके बच्चे भी घर पर नहीं रह रहे थे। हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। ऐसे में दो में से एक ही काम हो सकता था। या तो नौकरी की जाए या पिताजी की सेवा । ऐसे में उसने सारे असमंजस को दरकिनार करते हुए अंतिम निर्णय घर जाने का ले लिया।

घर आने पर उसके पिता को जो खुशी हो रही थी उसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है । बेटा नहीं बल्कि उनके लिए उनकी जिंदगी लौट आए हो । वैसे उनका समृद्ध परिवार रहा है । घर में कोई कमी नहीं थी । एक अकेले व्यक्ति के लिए जो चाहिए था उससे भी कहीं ज्यादा उसके पास था। बस आवश्यकता थी प्रेम की , अपनत्व की।

वह अपने पिता की हर प्रकार से सेवा करने लगा। एक प्रकार से छाया की भांति अपने बाबू की सेवा में लगा रहता । जिसके कारण उसके पिताजी के जीवन में नव स्फूर्ति नवप्राण लौट आए।

सच है कि प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश इसीलिए किया करते हैं कि उसके बुढ़ापे में बच्चे भी उसके सहारा बने । उसे नौकरी छोड़ने का थोड़ा पछतावा जरूर हो रहा था लेकिन पिता की सेवा का जो सुख मिल रहा था उसकी तुलना में वह नगण्य था । उसकी सेवा के कारण उसके पिता को नई जिंदगी जो मिल गई थी।

अक्सर हम जीवन में माया रुपी कंकर पत्थरों को इकट्ठा करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं की माता-पिता की सेवा से जो असीम सुख शांति मिलता है उसे भुला देते हैं। अक्सर बच्चे यदि एक बार घर से निकल जाते हैं तो नौकरी मिलने पर वही शिफ्ट होने का प्लान बनाते हैं । जिसके कारण वह अपने परिवार माता-पिता से दूर होते जाते हैं। फिर एक दिन ऐसा आता है कि जिस मिट्टी में पहले बड़े हैं उसी मिट्टी गोबर में उन्हें बदबू आने लगती है।

अधिकांश एक फ्लैट के चक्कर में उनके गांव में बाप दादाओं द्वारा बनाया गया महल वीरान सा हो जाता है।
कभी-कभी ऐसी नौबत आ जाती है कि माता-पिता को एक घूंट अंतिम समय में पानी भी नहीं मिलता और जिन बच्चों को इतने ममता से पाला पोशा था उनकी याद करते हुए उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
सौभाग्यशाली वे लोग हैं जिनके अंतिम समय में उनके बच्चे उनके साथ होते हैं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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