किस अंदाज़ से मुख्तलिफ थे तुम हमसे
किस अंदाज़ से मुख्तलिफ थे तुम हमसे

किस अंदाज़ से मुख्तलिफ थे तुम हमसे

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राह भटक ही जाए साहिल ऐसी तो ना थी

ढूंढ़ने से ना मिले मंजिल ऐसी तो ना थी

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किस अंदाज़ से मुख्तलिफ थे तुम हमसे

पेहले तुम भी कामिल ऐसी तो ना थी

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उदासी है कैसे और ये कहाँ से आया है

ये ज़ीस्त वर्ना मुश्किल ऐसी तो ना थी

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मुसलसल तबियत बिगड़ा चला जा रहा है

कभी हाल हमारी माइल ऐसी तो ना थी

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रूठ लिया खुद से, अब मनाएगा तुझे कौन

नाराज़ हमारी हाल-ए-दिल ऐसी तो ना थी

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कुछ तख़्लीक़ी थी, कुछ हुनर था मगर

‘अनंत’ तुम्हारे छोड़े महफ़िल ऐसी तो ना थी

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शायर: स्वामी ध्यान अनंता

 

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