Main Akela

मैं अकेला थोड़ी हूँ | Main Akela

मैं अकेला थोड़ी हूँ 

( Main akela thodi hoon )

 

अन्धड़ों से भिड़ सके जो और भी सागर में हैं।
मैं अकेला थोड़ी हूँ।।

कुंद इन्दु रजत प्रभामय कामिनी सुरपुर हला सी।
कोमलांगी पुष्पबाला हृदय रमणी चंचला सी।
मैं भ्रमर हूँ इस कली का सोचकर सपने सजाये।
कुछ दिनों पश्चात भ्रम टूटा तभी जब देख पाये।।
मेरे जैसे और भी ग्रह अनवरत चक्कर में हैं,
मैं अकेला थोड़ी हूँ।।

बात न मानी किसी की रूपसी एक उर बसाया।
हृदय में विश्वास भर के एक दिन परिणय रचाया।
क्या बताऊँ रात में ले वस्त्र गहने और धन को।
भाग ली वह रात में ही मैं लगा रिझाने मन को।।
हाथ मल मल रोने वाले और भी सहचर में हैं।
मैं अकेला थोड़ी हूँ।।

निशि दिवस अविरत अथक श्रम स्वेद रस मैंने बहाये।
अर्ध तृप्तित उदर सोया प्राण संकट नित्य आये।
लूट हत्या घूसखोरी ने वृहद ताण्डव दिखाया।
पीर अन्तस की छिपाकर मनस को ऐसे मनाया।।
कंटकों पर सोने वाले और भी थलचर में हैं।
मैं अकेला थोड़ी हूँ।।

जिनको कन्धे पर बिठाकर मैं बहुत इठलाता था।
मेरे घर के दीप है ये सोचकर सुख पाता था।
समय का संचरण है मेरा बुढ़ापा आ गया जब।
वही मेरा लाल वृद्धाश्रम मुझे पहुँचा गया तब।।
वहाँ देखा मेरे जैसे और भी अन्दर में है।
मैं‌ अकेला थोड़ी हूँ।।

 

लेखक: शेषमणि शर्मा”इलाहाबादी”
प्रा०वि०-नक्कूपुर, वि०खं०-छानबे, जनपद
मीरजापुर ( उत्तर प्रदेश )

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