मैं कितना बदल गया
मैं कितना बदल गया
नस्लें बर्बाद हो गई हमारी आज के इस व्यवहार में,
हर कोई आज बिक गया रिश्वत के इस पुरस्कार में।
अपनी पर ध्यान नहीं देते पर पराई पर हम देते रहे,
अब वो कहां शिष्टाचार बचा है अपनों के संस्कार में।।
हम तो रिश्वत से अपना ख्वाब पूरा करना चाहते हैं,
आजकल हम एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हैं।
किसी को अब आपस में भाईचारा और प्रेम नहीं रहा,
बस हम अपने को सर्वश्रेष्ठ,सर्वगुण बताना चाहते हैं।।
अब परिवार,परिवार ही नहीं रह गया है इस जमाने में,
बताओ किसे फिक्र पड़ी है संयुक्त परिवार को बचाने में।
सब एकल ही रहना चाहते हैं और पंसद भी करते सभी,
आजकल किसे फिक्र पड़ी है मां-बाप के पैर दबाने में।।
ये आजकल के नए-नए चोंचले को बनाकर हम जी रहे हैं,
वाह,बासी भोजन को ताजा बताकर ग्रहण कर रहे हैं हम।
बस आज हमको सिर्फ बिमारियों से मोहब्बत हो पाई है,
मां बाप के आशीर्वाद के लिए अब नहीं तरस रहे हैं हम।।

प्रभात सनातनी “राज” गोंडवी
गोंडा,उत्तर प्रदेश
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