मांझा | Manjha par kavita
मांझा
( Manjha )
मान जा रे मान जा रे
माँझे अब तो जा मान
गर्दन काट उड़ा रहा है
क्यों लोगों की जान ?
डोर न तेरी टूटती है
तू साँसों को तोड़े
गर्दन कटी देख बच्चों की
माँ बाप सिर फोड़े
तलवार है रह म्यान में
मत ना सीना तान
मान जा रे मान जा रे
माँझे अब तो जा मान
खुशियाँ कट कट गिरती है
घायल होते शरीर
चंचल फ़ेज़ का नाम मिटा
मिटी न घर की पीर
कोर्ट थानों की शख़्ती पर
जूँ ना रेंगी कान
मान जा रे मान जा रे
माँझे अब तो जा मान
लहराती पतंगें देखूँ
लगे खड़ग लहराती
कटी हुई को देखूँ तो
छाती बैठ जाती
आकाश परिंदों का घर है
दे दो जीवन दान
मान जा रे मान जा रे
माँझे अब तो जा मान
रचनाकार : शांतिलाल सोनी
ग्राम कोटड़ी सिमारला
तहसील श्रीमाधोपुर
जिला सीकर ( राजस्थान )
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