Mazdoor

मजदूर पर कविता | Mazdoor

मजदूर पर कविता

( Mazddor par kavita )

 

दोजून निवाला सही से नसीब ना हुआ
मेरे हाथो आज तेरा सुंदर महल बन गया
अपना तो झोपड़े में गुजारा हो गया
कभी ठंड मे ठीठुर कर मैं सो गया
कभी बारिश में भीग कांपता
रह गया,
कभी पसीने से लथपथ हो गरम थपेड़े सह गया
मेरे हाथो आज तेरा सुंदर महल बन गया
एयर कंडीशनर लगाकर तुम परेशान हो
मै तो बरगद की खुली हवा मे धन्य हो गया
यूं हिकारत से देखो ना मुझे तुम
मेरी मेहनत से ही तुम्हारा घर रोशन हो गया

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

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