• दिल लगाते लगाते | Ghazal Dil Lagate Lagate

    दिल लगाते लगाते ( Dil Lagate Lagate ) मुहब्बत में दिल को लगाते-लगाते, भुला खुद को बैठे भुलाते-भुलाते ! कैसे हम बताये की कितना है हारे, झूठा सा दिलासा, दिलातें-दिलातें ! गुजारे कई युग तेरी चाह रखकर, कहाँ आ गए दिल दुखाते-दुखाते ! बंजर हो गए है ये नैना हमारे, आँखों के ये आंसू छुपाते-छुपाते…

  • गौतम बुद्ध पर कविता

    गौतम बुद्ध पर कविता   बुद्ध पूर्णिमा के दिन जन्मे बुद्ध पूर्णिमा के दिन पाया ज्ञान ‘ । बुद्धपूर्णिमा के दिन ही हुआ जिनका महापरिनिर्वाण ‘ । उसे ही हम गौतम बुद्ध कहते है । अक्रोध से क्रोध को भलाई से दुष्ट को दान से कंजूस को सच से झूठ को जीतना सिखाता जो उसे…

  • भानुप्रिया देवी की कविताएँ

    भगवान बुद्ध में भगवान बुद्ध में दया,करुणा कूट-कूट कर भरा हुआ था। सबके लिए उमड़ती चिंता मन में, सभी के कष्ट को अपना कष्ट। इसलिए तो मृत,रोगी,वृद्ध देख मन हुए दर्वित,दु:खी,उदासी । मनुष्य को इतना दुर्दशा है, पता नहीं कब किया होगा , क्यों ना हम जन्म के मूल मातृत्व का चक्कर बंधन से ही…

  • बुद्ध वाणी | Kavita Buddha Bani

    बुद्ध वाणी ( Boudha Bani )   सुन प्राणी बुद्ध की वाणी बुद्ध शरण गच्छामि सुन प्राणी धम्म शरण गच्छामि संघ शर्ण गच्छामि सुन प्राणी चार आर्य सत्य दुख कारण निदान वह मार्ग जिससे होता दुख का पूर्ण निदान पंचशील प्रमुख जान हत्या चोरी व्यभिचार असत्य मधपान अष्टांगिक मार्ग के जीवन सुखमय बनाने के सोपान…

  • नदिया | Kavita Nadiya

    नदिया ( Nadiya )   नदिया बही जा रही धीरे धीरे दरिया की ओर बढ़ी जा रही धीरे धीरे लगी है भीड़ नहाने की देखो कोई डूब रहा कोई डूबा रहा देखो चली ये कैसी हवा धीरे धीरे जहर हि दवा बनी धीरे धीरे बचना नहीं है किसी को नदी से चली आ रही हकीकत…

  • है बहुत कुछ | Kavita Hain Bahot Kuch

    है बहुत कुछ ( Hain Bahot Kuch )   है बहुत कुछ मन में कहने को लेकिन मन में संभाल कर रखा हूं तेरे पास अपना दिल गिरवी मैने देख भाल कर रखा हूं तुम्हें क्या लगती है अंजान में तुम्हें चुना हूं नहीं नहीं मैंने बहुत कुछ देखा फिर तेरे लिए ख्वाब बुना हूं…

  • अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस

    अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस   प्रकृति से प्रीत कर,खुशियों को पंख लगाएं पेड़ पौधे जीव जन्तु, सदैव मनुज परम मित्र । नदी पर्वत व सागर सह, स्वर्ग सदृश सुनहरे चित्र । सहेज मातृ वत्सल आभा, परिवेश उत्संग आनंद पाएं । प्रकृति से प्रीत कर,खुशियों को पंख लगाएं ।। नैसर्गिक सानिध्य अंतर, जीवन सदा आह्लादित ।…

  • मरघट की ओर | Marghat ki Or

    मरघट की ओर ( व्यंग्य रचना ) बज उठा, चुनावी बिगुल! निकल पड़े हैं मदारी, खेल दिखाने! बहलाने, फुसलाने, रिझाने, बहकाने! उज्जवल —— अपना भाग्य बनाने! जनता का दु:ख -दर्द, जानकर भी, बनते हैं जो अनजाने! आओ दु:खियारों, चलो -चलें, मरघट की ओर, इन मक्कारों की, मिलकर चिता जलाने! जमील अंसारी हिन्दी, मराठी, उर्दू कवि…

  • सादगी अच्छी नहीं | Saadgi Shayari

    सादगी अच्छी नहीं ( Saadgi Achi Nahi )   हद से ज़्यादा सादगी अच्छी नहीं बेहिसों से बंदगी अच्छी नहीं। पास है दरिया समंदर मांगता देख इतनी तिश्नगी अच्छी नहीं। जानकर सब नासमझ बनता है वो बस अदा उसकी यही अच्छी नहीं तू न हो जिसमें तेरा जलवा न हो मौत सी वो ज़िंदगी अच्छी…

  • पूर्ण बेटी से वो हसरत हो गई

    पूर्ण बेटी से वो हसरत हो गई   ज़र जमीं की जब वसीयत हो गई । टेढ़ी उन बेटो की नीयत हो गई ।। ठीक वालिद की तबीयत हो गई । जान को उनकी मुसीबत हो गई ।। जिस तरह औलाद खिदमत कर रही । हर किसी को देख हैरत हो गई ।। चाहते तो…