• परिणय जीवन का बसंत | Parinay Jeevan

    परिणय जीवन का बसंत ( Parinay jeevan ka basant )   दिव्य भव्य श्रृंगार बेला, प्रतिपल नेह अनंत वृष्टि । कांतिमय अंग प्रत्यंग , अति आनंद परिपूर्ण सुदृष्टि । उर तरंग चाहत स्पंदन, वंदन अभिनंदन प्रणय मंत । परिणय जीवन का बसंत ।। मृदुल मधुर अहसास, विमल पुनीत हिय भावना । सरित प्रवाह मंगलता, असीम…

  • मन को भाता है कम्प्यूटर | बाल कविता

    मन को भाता है कम्प्यूटर (बाल कविता) कम्प्यूटर एक अनोखी चीज़, छोटे-बड़े सभी का अजीज़। घर, बिजनिस, स्कूल और दफ्तर, काम चले न बिना कंप्यूटर। काम सभी ये झटपट करता, बजे रेडियो, टीवी चलता। इसमें फोटो, पेंटिंग, खेल, कैलकुलेटर, वीडियो, मेल। गाता गाने, है हर भाषा, पूरी करता सबकी आशा। गिनती में ये सबसे तेज,…

  • बिन तुम्हारे | Bin Tumhare

    बिन तुम्हारे ( Bin Tumhare )    सुनो मेरी कितनी शामें तन्हा निकल गई, बिन तुम्हारे कितने जाम बिखर गए सर्दी में ,बिन तुम्हारे लिहाफ भी अब तल्ख लगने लगा है सर्द दुपहरी भी अब तपने लगी,बिन तुम्हारे मौसमों ने भी ले ली है कुछ करवट इस तरह कोहरे की जगह ले ली है अब…

  • महत्व | Mahatva

    महत्व ( Mahatva )    गलतियाँरोज नहीं रोज नहीं होती दोबारा की मानसिकता और बार-बार की मूर्खता कहलाती है जो बदल देती है जीवन का मानचित्र और आदमी उसी में स्वयं को ही तलाशता रह जाता है पूरी उम्र भर स्वाभाविक का और सहजता व्यक्ति के सर्वोच्च शिखर हैं पूर्णता किसी में नहीं किंतु पूर्ण…

  • बोलो जय जय शेखावाटी | Shekhawati

    बोलो जय जय शेखावाटी   रज रज शौर्य अनूप श्रृंगार, अनंत देश प्रेम अंतर पटल । जीवन आह्लाद राष्ट्र रक्षा , शिक्षा प्रगति संकल्प अटल । सेठ साहूकार अवतरण स्थली, वीर प्रसूता अलंकृत धरा माटी । बोलो जय जय शेखावाटी ।। झुंझुनूं सीकर चूरू सह, नीम का थाना उपमा परिधि । राव शेखा जी संस्थापक…

  • गुलाबी | Gulabi

    गुलाबी ( Gulabi )   आई बेला मिलन की आप और गुलाबी हो गए पहले ही थे नैना मतवाले अब और शराबी हो गए झूम उठी है अमराई यौवन ने ली है अंगड़ाई अधरों पर छाई लाली गाल गुलाबी हो गए उठकर गिरती पलकेँ भी भर आई हैं मादकता में छूते केश कपोलों को तुम…

  • इंसानियत का रथ | Insaniyat ka Rath

    इंसानियत का रथ ( Insaniyat ka rath )   शर्मिंदा किस कदर है इंसानियत का रथ बढ़ता ही जा रहा है हैवानियत का रथ वाइज़ बिछा रहे हैं बस अपनी गोटियाँ रोकेगा कौन देखो शैतानियत का रथ हो जायें बंद अब यह फिरक़ापरस्तियां आयेगा शहर में कब इंसानियत का रथ निकला हूँ फूल लेके उस…

  • लघु कथा सुकून | Laghu Katha Sukoon

    सीता पेपर देने अपने पति के साथ भोपाल आई थी। पेपर अच्छा रहा लौटते समय एक सुलभ कांप्लेक्स के सामने गाड़ी रोक कर सीता के पति कहने लगे । बड़ा साफ सुथरा है, सुलभ कांप्लेक्स। जब तुम पेपर देने गई थी। तब हम लोग यहां आए थे। तुम भी फ्रेश हो जाओ फिर रास्ते में…

  • जब मर्यादाएं बोझ लगे | Jab Maryadaye

    जब मर्यादाएं बोझ लगे ( Jab maryadaye bojh lage )   जब मर्यादाएं बोझ लगे, जरा अंतर्मन में झांको तुम। क्या हमको संस्कार मिले थे, संस्कृति में ताको तुम। मर्यादा पालक रामजी, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। मातपिता की आज्ञा लेकर, लक्ष्मण संग वन धाए। मर्यादा में रहकर सीताजी, सतीव्रता नारी कहलाई। सावित्री यमराज से, पति के…

  • लेखक | Lekhak

    लेखक ( Lekhak )    सत्य का समर्थन और गलत का विरोध ही साहित्य का मूल उद्देश्य है कहीं यह पुष्प सा कोमल कहीं पाषाण से भी सख्त है कहीं नमन है वंदन है कहीं दग्ध लहू तो कहीं चंदन है मन के हर भावों का स्वरूप है साहित्य हर परिस्थितियों के अनुरूप है साहित्य…