ये है कैसी मजबूरी है
ये है कैसी मजबूरी है ये है कैसी मजबूरी है! मिलना पर उससे दूरी है बात अधूरी है उल्फ़त की न मिली उसकी मंजूरी है जाम पिया उल्फ़त का उसके हाथों में अब अंगूरी है टूटी डोर मुहब्बत की ही न मिली उसकी मंजूरी है भौरा क्या बैठे फूलों…
ये है कैसी मजबूरी है ये है कैसी मजबूरी है! मिलना पर उससे दूरी है बात अधूरी है उल्फ़त की न मिली उसकी मंजूरी है जाम पिया उल्फ़त का उसके हाथों में अब अंगूरी है टूटी डोर मुहब्बत की ही न मिली उसकी मंजूरी है भौरा क्या बैठे फूलों…
सच्चाई की ताकत ***** मैं सच कहता रहूंगा ज़ालिम! चाहे उतार लो- मेरी चमड़ी खिंचवा लो मेरे नख होउंगा नहीं टस से मस? मजबूत हैं मेरे इरादे चाहे जितना जोर लगा लें पीछे नहीं हटूंगा सच कहता हूं कहता ही रहूंगा। जुल्म के आगे तेरे नहीं मैं झुकूंगा मरते दम तक सच ही कहूंगा। मरने…
ओ मेरी प्रियसी ( नेपाली कविता ) तिम्रा ति घना काला नयनहरु मा कतै त हौंला म तिम्रा चयनहरु मा अपार प्रेम राखी हृदय को द्वारमा आएँ म प्रिय तिम्रो सयनहरु मा पिडा को गाथा लिई म आएँ तिमि सामु तिमि तर आयौं कथा का बयानहरू मा मेरो गीत, मेरो…
शिक्षण सेवा के २१ वर्ष ****** ख़ुशी का है दिन आज- मना लो खुशी, आज ही के दिन हुई थी- तुम्हारी नियुक्ति। ली थी तुमने- पद , गोपनीयता , सेवा की शपथ, खायी थी कसम होगे न पथ भ्रष्ट। आज २१वीं बरसी पर दिल पर हाथ रख- पूछो अन्तर्मन से कुछ सवाल, इन वर्षों में,…
ग़म के मारों को खबर क्या दिल्लगी क्या चीज है ग़म के मारों को खबर क्या दिल्लगी क्या चीज है। लोग जिंदा-दिल समझ पाये हँसी क्या चीज है।। दिल मिला हो जिससे गहरा उससे दूरी फिर कहां। दिल लगाकर हमने जाना आशिकी क्या चीज है।। इक नशा सा छा रहा है दिल…
जीस्त में कब मेरी ख़ुशी आयी जीस्त में कब मेरी ख़ुशी आयी! दर्द ग़म की आंधी चली आयी दौर आया ऐसा जीवन में ही रोज़ ही आंखों में नमी आयी नफ़रतों का ही दौर आया है जीस्त में प्यार की कमी आयी लें गयी है बहा के सब खुशियां जीस्त…
याद रह रह के कोई मुझको आता है बहुत ( Yaad rah rah ke koi mujhko aata hai bahut ) याद रह रह के कोई मुझको आता है बहुत! प्यार उसका मेरे दिल को तड़पाता है बहुत! कह हवाओं से चरागों ने खुदकुशी कर ली, अज़ाब-ए-तीरगी आके अब डराता है बहुत! …
जज्बातों की आंधी ***** जब चलती है वेदी पर उसके बहुत कुछ जल जाती है। वेग उसकी होती अथाह, पल में सब-कुछ कर देती तबाह। रौंद डालती सब-कुछ, विशाल और क्षुद्र। दिखता न उसको- सही और ग़लत, मिले जो कुछ पथ में- उठाकर देती है पटक! शांत वेग जब होता, सामने कुछ न होता। बिखरे…