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TheSahitya – द साहित्य
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TheSahitya – द साहित्य
  • मां
    कविताएँ

    मां

    ByAdmin September 30, 2020December 31, 2020

    मां   मां एक अनबूझ पहेली है, मां सबकी सच्ची सहेली है, परिवार में रहती अकेली है, गृहस्थी का गुरुतर भार ले ली है। ऐ मां पहले बेटी,फिर धर्मपत्नी, बाद में मां कहलाती हो। पहली पाठशाला,पहली सेविका तूं घर की मालकिन कहलाती हो।। बुआ,बहन,मामी,मौसी कहलाये, माता,दादी,नानी नाम बुलवाये, परिवार की जन्म दात्री नाम सुहाये, अबला,सबला,…

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  • स्वर्ग-नर्क
    कविताएँ

    स्वर्ग-नर्क | Poem in Hindi on Swarg narak

    ByAdmin September 29, 2020January 18, 2023

    स्वर्ग- नर्क ( Swarg – Narak )   स्वर्ग है या नर्क है कुछ और है ये। तूं बाहर मत देख तेरे ठौर है ये।। तेरे मन की हो गयी तो स्वर्ग है। मन से भी ऊपर गया अपवर्ग है। आत्मतत्व संघत्व का सिरमौर है ये।। तूं बाहर० मन की अभिलाषा बची तो नर्क है।…

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  • प्रेम ( दोहा )
    दोहे

    प्रेम | Prem Ke Dohe

    ByAdmin September 29, 2020January 18, 2023

    प्रेम  ( Prem )   १) प्रेम की बंसी सुमधुर,मंत्रमुग्ध करी जाए। सुध-बुध का न पता चले,एकांत समय बिताए।।   २) जीवन में प्रेम महान, कुछ न इसके समान। मान सम्मान जहां मिले,वही है स्वर्ग स्थान।।   ३) नमन से नयन मिलाओ, आंखें कर लो चार। प्रेमरोग में जो पड़े,छुट जावे संसार ।।   ४)…

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  • ग़र ना होती मातृभाषा
    कविताएँ

    ग़र ना होती मातृभाषा | Matribhasha Diwas Par Kavita

    ByAdmin September 29, 2020January 18, 2023

    ग़र ना होती मातृभाषा ( Gar na hoti matribhasha )      सोचो    सब-कुछ    कैसा  होता, ग़र     ना     होती   मातृभाषा ।।   सब     अज्ञानी    होकर    जीते जग-जीवन     का   बौझा  ढोते, किसी  विषय  को   पढ पाने की कैसे   पूरी    होती  अभिलाषा।।   कैसे    अपना     ग़म    बतलाते कैसे    गीत     खुशी    के   गाते, दिल  की  दिल  में ही …

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  • ढूंढ़ता हूँ रोज़ ऐसी दोस्ती मैं
    शेरो-शायरी

    ढूंढ़ता हूँ रोज़ ऐसी दोस्ती मैं | Dosti Heart Touching Shayari

    ByAdmin September 29, 2020January 18, 2023

    ढूंढ़ता हूँ रोज़ ऐसी दोस्ती मैं ( Dhoondhta hoon aisi dosti mein )    थक गया हूँ ढूंढ़ता ही ख़ुशी मैं! जी रहा हूँ ग़म भरी सी जिंदगी मैं   दें हमेशा जो वफ़ा की मुझको ख़ुशबू ढूंढ़ता हूँ रोज़ ऐसी दोस्ती मैं   नफ़रतों के दर्द ग़म इतनें मिले है हाँ भुला अपनें लबों…

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  • भिखारी
    कविताएँ

    भिखारी | Hindi Poem on Bhikhari

    ByAdmin September 29, 2020January 18, 2023

    भिखारी ( Bhikhari )    फटे पुराने कपड़ों में मारे मारे फिरते हैं भिखारी, इस गांव से उस गांव तक इस शहर से उस शहर तक न जाने कहां कहां ? फिरते हैं भिखारी । अपनी भूख मिटाने/गृहस्थी चलाने को न जाने क्या क्या करते हैं भिखारी? हम दो चार पैसे दे- अनमने ढंग से…

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  • हिन्दी मे कुछ बात है | Short Poem on Hindi Diwas
    कविताएँ

    हिन्दी मे कुछ बात है | Short Poem on Hindi Diwas

    ByAdmin September 29, 2020January 17, 2023

    हिन्दी मे कुछ बात है ( Hindi me kuch baat hai )    हिन्दी दिवस पर विशेष  (कविता)  हिन्दी अपनी मातृभाषा, हिन्दी में कुछ बात है! हिन्दी बनी राष्ट्र भाषा, भारत देश महान में। ‘नेताजी’ ” के हिन्दी नारे, गूंजे हिंदुस्तान में। ‘गुप्त’ सरीखे राष्ट्र-कवि, ‘तुलसी’ जैसे महाकवि। जाने कितने अमर हो गए, लिखकर इसी…

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  • आ जलाये दिल में रोशनी इल्म की
    शेरो-शायरी

    आ जलाये दिल में रोशनी इल्म की | Ilm Par Shayari in Hindi

    ByAdmin September 29, 2020January 17, 2023

    आ जलाये दिल में रोशनी इल्म की ( Aa jalaaye dil mein roshani ilm ki )    आ जलाये दिल में रोशनी इल्म की रोशनी हर दिल में हो सभी इल्म की   रोशनी ये बुझेगी न दिल से कभी होगी रोशन सदा जिंदगी इल्म की   फैलायेगी जहां में रोशनी बनके होगी हर चेहरे…

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  • पीर हमरे करेजवा में आवल करी
    कविताएँ

    पीर हमरे करेजवा में आवल करी | Bhojpuri Kavita in Hindi

    ByAdmin September 29, 2020January 17, 2023

    पीर हमरे करेजवा में आवल करी (भोजपुरी-इलाहाबादी) गीत जब केउ सनेहिया क गावल करी। पीर हमरे करेजवा में आवल करी।। माया क जहान प्रेम सत्य क निशनवां, प्रेम की दीप जलै निशि दिनवा दिल में रहिके दिल काहे दुखावल करी।। पीर हमरे करेजवा…. राधाकृष्ण हीर रांझा प्रेम की मुरतिया, मीरा क प्रेम प्याला सुनि फटइ…

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  • भूख
    कविताएँ

    भूख | Bhookh Par Kavita

    ByAdmin September 29, 2020January 17, 2023

    भूख ( Bhookh )   मैं भूख हूं, मैं मिलती हूं हर गरीब में अमीर में साधू संत फकीर में फर्क बस इतना किसी की पूरी हो जाती हूं कोई मुझे पूरा करने में पूरा हो जाता है मैं आदर्शवाद के महल के पड़ोस में पड़ी यथार्थवाद की बंजर जमीन हूं में मिलती हूं मजदूरों…

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