• आज़माया करो | Azmaya Karo

    आज़माया करो सब्र मेरा न यूँ आज़माया करोरूबरू ऐसे सज कर न आया करो इतनी बातें न हमसे बनाया करोजामे – उल्फ़त ख़ुशी से पिलाया करो साक़िया तुम को इस प्यासे दिल की क़समशाम ढलते ही महफ़िल सजाया करो प्यार की मौजें दिल में पटकती हैं सरइस समुंदर में आकर नहाया करो कैसे जानें कि…

  • माया का बंधन | Maya ka Bandhan

    माया का बंधन माया का बंधन हमको छलताप्रेम फिर भी मन में पलतायह राज न जाने कोई ।मां का बंधन सबको प्यारासारा जग यह जानता ।प्रेम माँ का होता निश्छलसारा जग यह मानता ।भूखे रहकर खाना देतीसहती रहती कुछ न कहतीयह राज न जाने कोई ।कई रूप होते बंधनो केबुझना होता कठिन ।जन्म देना सरल…

  • वो घूंघट पट खोल रहा है

    वो घूंघट पट खोल रहा है वो घूंघट पट खोल रहा हैतन-मन मेरा डोल रहा है आजा,आजा,आजा,आजामन का पंछी बोल रहा है अपने नग़मों से वो मेरेकानों में रस घोल रहा है पाप समझता था जो इसकोवो भी अब कम तोल रहा है मेरे घर की बर्बादी मेंअपनों का भी रोल रहा है लगते हैं…

  • मैं कितना बदल गया

    मैं कितना बदल गया नस्लें बर्बाद हो गई हमारी आज के इस व्यवहार में,हर कोई आज बिक गया रिश्वत के इस पुरस्कार में।अपनी पर ध्यान नहीं देते पर पराई पर हम देते रहे,अब वो कहां शिष्टाचार बचा है अपनों के संस्कार में।। हम तो रिश्वत से अपना ख्वाब पूरा करना चाहते हैं,आजकल हम एक दूसरे…

  • बड़ा ही नेक | Bada hi Nek

    बड़ा ही नेक बड़ा ही नेक वो परिवार होगातभी अच्छा मिला संस्कार होगा कभी हमने न सोचा अपने घर मेंमुझे करना खड़ी दीवार होगा जमीं तो बाँट ली तुम सबने मेरीलवारिस अब हमारा प्यार होगा घरों की बात थी इतना न सोचायही कल भोर का अख़बार होगा अदब से बात जो करते हैं बच्चेउन्हीं का…

  • मेरे हिस्से का प्रेम

    मेरे हिस्से का प्रेम मैं तुम सेदूर हूँधूप और छाँव की तरहपुष्प और सुगंध की तरहधरा और नील गगन की तरहदिवस और निशा की तरहजनवरी और दिसम्बर की तरहसाथ-साथ होते हुए भीबहुत दूर- बहुत दूर परन्तुप्रति दिन मिलता हूँतुम सेतुम्हारी नयी कविता के रूप मेंनये शब्दों के रूप में जीवन मेंकभी कोई सुयोग बना..तोमैं तुम…

  • अपनी दुनियां | Apni Duniya

    अपनी दुनियां इस दुनिया के भीतर भी अपनी एक दुनिया होनी चाहिएमन के राज वहीं पर खोलना चाहिए इस दुनिया में जिसकी अपनी नहीं होती एक दुनियावह विचरता रहता है भ्रम और जाल मेंदुखी होता रहता है संसार के अंदर लेकिन जिसके भीतर अपनी एक दुनिया होती हैवह सदा मस्त रहता है अपने ही भावों…

  • बोली नहीं, हिंदी की सहभाषा है हरियाणवी : डॉ. रामनिवास ‘मानव’

    फूहड़ सांगों, अश्लील रागनियों और भोंडे चुटकुलों से बढ़ना होगा आगे हरियाणवी बोली प्राचीन काल से ही अत्यंत समृद्ध रही है तथा पालि, प्राकृत आदि अन्य भाषाओं की भांति, इसका विकास भी सीधे संस्कृत से हुआ है। स्पष्ट है कि बोली नहीं, हिंदी की सहभाषा है हरियाणवी। भाषा के आधार पर ही, पंजाब से अलग…

  • कोकिला उपवन क्यों न आई

    कोकिला उपवन क्यों न आई कोकिला उपवन क्यों न आईखिली बहारें यहां रुत पतझड़ीकिसलय ने अश्रु बूंदें टपकाईकोकिला उपवन क्यों न आई काली आंखें काला वस्त्रपहन कौन तू देश गईतेरे गीतों तेरी धुनों सेसजी क्या महफिल नईकोमल – कोमल पत्ते डालीचुप थे तुझ बिन न खड़खड़ाएफाख्ता उदास अमलतास पर बैठीउसने पंख न फड़फड़ाएआम्र मंजरी रूठी…

  • ये क्या हुआ

    ये क्या हुआ तू सत्य की खोज में चल मानव,क्योंकि हर तरफ दिख रहा है दानव।। सब एक दूसरे को खाने में लगे हुए हैं,रईस गरीब को सताने में लगे हुए हैं।। मानवता बिकी पड़ी है बाजार में,यह दुनिया फंसी फरेबी मक्कार में।। ये बाप और बेटे रिश्ते भूल गए हैं,बच्चे संस्कार वाले बस्ते भूल…