परीक्षा
परीक्षा

परीक्षा

***

मन से ,
बिना मन से।
पास होने के उल्लास,
फेल होने की गुंजाइशों के साथ।
इंसान को ,
देनी ही पड़ती है परीक्षा!
विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों
आयोगों में-
इसके लिए विधिवत रूटिन/कैलेंडर होता है,
समयानुसार परीक्षा आयोजित होता है।
नियत समय पर परिणाम हैं आते,
परीक्षार्थी पास/फेल हैं होते।
सभी अपनी क्षमताओं की सीढ़ी चढ़ते,
कुछ मंजिल पा, ऊंचाइयों को हैं छूते।
तो कुछ हताश/ निराश हो-
धरा पकड़ लेते !
पर उम्मीद नहीं छोड़ते?
एक राह बंद हुआ तो क्या?
अनेक रास्ते अभी खुले हैं जग में,
जो हैं उन्हीं के हक में।
कर रहें हैं उनका इंतजार!
अनंत संभावनाओं के द्वार,
किसी एक को पकड़ ,सब कर ही लेते हैं
अपना बेड़ा पार!
जिसको जो जहां मिल गया,
उसे ही लेकर निकल पड़ा।
भाग्य का फल मान,
अपना सीना तान।
विजय पथ अग्रसर हो जाता है,
पर परीक्षाओं से उसे!
छुटकारा कहां मिल पाता है?
मानव को तो जीवन भर,
पग पग पर ।
देनी ही पड़ती है , परीक्षा!
कभी दोस्त आजमाते,
तो कभी
परिवार वालों के सवालों से टकराते?
अपने कर्त्तव्य पर चलते,
मंजिल तलाशते।
अपनों के लिए,
सपनों के लिए।
अनेकानेक परीक्षाओं के-
प्रश्न हल करते जाता है इंसान!
कहीं पास ,
तो कहीं फेल हो जाता है इंसान।
फिर भी
जीवन के इस भंवर में,
संभावनाओं के चंवर में।
विचरण करते रहता है इंसान,
जीवन भर परीक्षा देकर भी-
अंत में अकेला ही चला देता है इंसान।

 

🍁

नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

यह भी पढ़ें :

ऐ चीन ! तुझे न छोड़ेंगे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here