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फालतू की राय

“पिताजी, मैं ग्रीन सिटी के बराबर में जहाँ पर प्लॉटिंग हो रही है, वहाँ एक प्लॉट लेना चाहता हूँ। आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या मेरा वहाँ प्लॉट लेना ठीक रहेगा?”
मोहित ने अपने एडवोकेट पिता नरेश जी के ऑफिस में घुसते हुए पूछा।

“ठीक है। ले लो। कोई दिक्कत नहीं।”
अपने वकील मित्र राजेश के साथ ऑफिस का कुछ जरूरी काम निपटाते हुए राजेश ने कहा। पिताजी से सहमति लेकर मोहित खुशी-खुशी उनके ऑफिस से बाहर निकल गया। अब राजेश ने नरेश से पूछा-

“तुमने अपने बेटे को ग्रीन सिटी के बराबर में प्लॉट खरीदने के लिए सहमति कैसे दे दी? क्या तुम नहीं जानते कि वह जगह विवादित है? हमारे पास ही तो उस जगह का मुकदमा चल रहा है। वहाँ पर रुपये निवेश करना निश्चित ही नुकसान का सौदा हो सकता है।”

“हाँ, मुझे सब पता है।”

“फिर तुमने ऐसा क्यों किया? मोहित को वहाँ प्लॉट लेने को मना क्यों ना किया? आपको उसको, वहाँ निवेश न करने के लिए सावधान करना चाहिए था।” आश्चर्य जताते हुए राजेश ने कहा।

“भाई तेरी बातें सब सही हैं, लेकिन मुझसे ज्यादा मोहित को कोई नहीं जानता। वह मेरा बेटा है। तुमने सुना…. उसने आते ही मुझसे, सबसे पहले क्या कहा? यही कहा ना…. कि वह वहाँ एक प्लॉट लेना चाहता है।

फिर इसके बाद उसने मेरी राय पूछी। इसका मतलब यह है कि वह वहाँ पहले ही प्लॉट खरीद चुका है या वहाँ प्लॉट खरीदने का निर्णय कर चुका है। बस अपनी संतुष्टि के लिए और मुझे वहाँ प्लॉट खरीदने की सूचना देने के लिए यहाँ आया था। उसको मेरी राय से कोई लेना-देना नहीं है।

जब हम किसी चीज के बारे में पहले से ही फैसला ले लेते हैं तो उसके बाद किसी की भी राय का कोई औचित्य नहीं बनता। मोहित पहले भी बहुत बार ऐसा कर चुका है। वह सिर्फ अपनी चलाता है।

मुझे अपना दुश्मन समझता है। आज तक वह मेरी सलाह को कभी अमल में नहीं लाया। अगर वह सच में मुझे मान देना चाहता है तो मेरा कहना उसको बहुत पहले ही मान लेना चाहिए था, लेकिन हर बार उसने यही किया।

मेरी कोई बात न मानी, हर बार अपनी चलाई और नुकसान उठाया। इसलिए मुझे उसे किसी भी मामले में राय देना सही नहीं लगता।

अब वह जो भी कहता है, उस पर अपनी सहमति देकर बात खत्म कर लेता हूँ क्योंकि मुझे पता है कि उसने आज तक सिर्फ मेरी सलाह ली ही है लेकिन अमल नहीं किया और सिर्फ अपनी ही चलाई है तो इस बार वह मेरी सुनेगा क्यों?

मैं उसको प्लॉट खरीदने को मना कर भी दूँ तो भी वह मेरी एक न सुनेगा। यही बोलेगा कि वहाँ सस्ता मिल रहा है। इसलिए जो व्यक्ति आपकी बातों की, भावनाओं की कद्र ना करे, वहाँ अपनी अनमोल, उचित सलाह देना उचित नहीं होता। यह मेरा मानना है।”

नरेश ने आगे बोलते हुए कहा-

“मानता हूँ कि सोच समझकर निर्णय लेना अच्छी बात होती है। कहा भी गया है कि सुनो सबकी, करो अपने मन की। लेकिन जहाँ मां-बाप, भाई-बहन, गुरु, दोस्त होते हैं… जिनको हम अपना मानते हैं। अगर वहाँ हम कोई राय लेने जाते हैं तो पहले से दिलो-दिमाग में कोई बात या कोई निर्णय लेकर नहीं जाना चाहिए और ना ही कोई फैसला पहले से करके जाना चाहिए। यदि आप पहले से ही अपने दिमाग में फिट अपने निर्णय पर कायम रहोगे तो फिर उनकी राय का कोई औचित्य ना रहेगा।

अपने शुभचिंतकों की बातों का, सलाह का मान रखना बेहद आवश्यक है, क्योंकि ये लोग हमारे दुश्मन नहीं होते। ये हमेशा आपको सच्ची सलाह ही देंगे, जो हमारे लिए हितकारी होगी।

अगर सिर्फ आप फॉर्मेलिटी के लिए ही राय लेना चाहते हैं तो यह बहुत गलत बात है। मुझे अपने बेटे का पता है कि वह सिर्फ फॉर्मेलिटी के लिए लिए ही मेरे पास आया था। करना उसे वही है जो उसे करना है। इसलिए मैंने दो शब्दों में अपनी बात खत्म कर दी। अब बता, मैंनें कुछ गलत किया?”

राजेश बोले-
“नहीं मित्र। तूने बिल्कुल भी गलत नहीं किया। तेरी कहानी से मुझे भी एक सीख मिली है कि मुफ्त में अपनी बेशकीमती राय उनको मत दो, जो हमारा कहना नहीं मानते। उनको उनके हाल पर छोड़ देना ही उचित है।”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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