राम लखन की रामायण का | Ram Lakhan ki Ramayan ka

राम लखन की रामायण का

( Ram lakhan ki ramayan ka ) 

 

राम लखन की रामायण का, हर पद सभी को याद है।
फिर क्यों अपनी वसुंधरा पर, होता रहता विवाद है ।।

क्षण-क्षण वसुधा पर मँडराते, अब विनाश के बादल हैं ।
एक दूसरे से लड़ने को ,पढ़े लिखे भी पागल हैं ।
दुराग्रहों के धनुषवाण से, मन भीतर तक घायल है।
शतरंजी चालों में उलझा ,लगता समय जल्लाद है ।।
राम लखन की—-

कहीं सुलगता काश्मीर तो, कहीं असम के छाले हैं।
देश द्रोहियों ने छुप-छुप कर,नाग विषैले पाले हैं ।
इनके कृत्यों से जननी के , चुभे हदय पर भाले हैं
मंदिर-मस्जिद से भी उठता ,
क्यों सरफिरा उन्माद है।।
राम लखन की—–

नगर ग्राम सीमाओं पर है ,विस्फोटों का धुआँ-धुआँ।
भय घातों से काँप रहा है ,मानवता का रुआँ-रुआँ ।
कुछ दूरी पर गहरी खाई , कुछ दूरी पर खुदा कुआँ।
भ्रष्ट आचरण दुराचार से , फैला यह सब विषाद है।।
राम लखन की—–

राम लखन की भाँति जवानों ,निशाचरों का नाश करो।
भय शंकित जनमानस में, निज पौरुष से विश्वास भरो ।
सीनों में अंगारे भर कर ,साग़र अब संत्रास हरो ।
इस युग का अब वीर सपूतों ,
हर ओर यही निनाद है ।।
राम लखन की—
फिर क्यों अपनी—

 

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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