शाबाश अनन्या
शाबाश अनन्या

शाबाश अनन्या

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तुने हिम्मत दिखाई,
खुद के लिए ‘राजधानी’ चलवाई।
रेल प्रशासन को झुकाई,
गया गोमो होते हुए ट्रेन रांची ले आई।
तुम बहादुर हो,
प्रेरणा हो;
शेरनी हो ।
अकेली हो इतनी हिम्मत दिखाई!
वरना 930 यात्रियों ने तो डाल्टेनगंज में ही ट्रेन ही छोड़ दी,
आवाज उठाने की हिम्मत न की!
अन्याय के खिलाफ न उठ खड़ा होना बुजदिली है,
साहस दिखाने पर ही किसी को मिलती मंजिल है।
पर सब चुपचाप चले गए बसों में बैठकर,
आवाज उठाने की जहमत भी नहीं की, अन्याय देखकर।
लेकिन तू नहीं मानी,
ट्रेन से जाने की ही ठानी।
अधिकारी कभी धमकाएं तो कभी किए मिन्नत,
यहां तक कि कोशिश की देने की लालच,
कार से भेजने की , की वकालत।
लेकिन ना हुई तू टस से मस,
अधिकारियों को कह दिया बस!
रांची तक का टिकट लिया है,
पूरा पैसा दिया है ।
बीच में क्यूं उतरूं?
बस पर या कार पर क्यूं चढ़ूं?
जाऊंगी तो ट्रेन से ही,
दो चार घंटे लेट से ही सही।
थक-हार कर रेल प्रशासन ने अकेली लड़की की खातिर-
राजधानी ट्रेन को रांची रवाना किया,
गया-गोमो के रास्ते उसे रांची पहुंचाया;
अनन्या तेरे साहस ने दिल जीत लिया।
लड़ गई तू अकेली सरकार से,
ठुकरा दी आॅफर जाने की कार से।
जीत गई तू,
अकेली ट्रेन रांची ले गई तू।
इस साहस को हम सलाम करते हैं,
तेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
ऐसे ही हिम्मती युवा पीढ़ी देश को चाहिए-
जो हक के लिए अपनी आवाज बुलंद करें,
सच्चाई के लिए जीए मरे;
देश के लिए अंतिम सांस तक लड़े।

 

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नवाब मंजूर

 

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

 

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