Swarg par Kavita

स्वर्ग | Swarg par Kavita

स्वर्ग 

( Swarg ) 

 

स्वर्ग   कहीं   ना   और,  बसा  खुद  के  अंतर में

खोज   रहे  दिन- रात  जिसे  हम  उस  अम्बर में

 

सुख   ही   है   वह   स्वर्ग  जिसे  हम  ढूंढे  ऊपर

बसा    हमारे    सुंदर   तन – मन   के   ही  अंदर

 

काट    छांट    कर    मूर्तिकार   जैसे   पत्थर को

दे    देता    है   रूप   अलग   गढ़कर  मंथर  को

 

दंभ    द्वेष    पाखंड    छांट   अपने    अंतर   के

बिना  मरे ही दिख जायेगा मन में स्वर्ग अम्बर के

 

लगे    बिमारी   में   चीनी   कड़ुआ   तीखी   भी

मन   में   चले   जब   द्वंद्व  का  खीचा खींची सी

 

वही  नर्क  फिर   हो  जाता  असली  जीवन  की

कर   देते   जब   व्यर्थ  वही   जीवन  पावन  सी

 

आपस   का   जब   प्रेम   बसे  सबके  अपनों में

कभी  उठे   न  भेद  भाव   भूल  कर   सपनों  में

 

नही    कोई    हो    गैर   ना    कोई   दुश्मन   हो

हो    आपस   में    सौहार्द   प्रेम   अपनापन   हो

 

देव    लोक   हो   जाता  है  घर   आगन  अपना

मात   पिता  परमेश्वर  जब   जिस  बसते  अगना

 

समझ  समझ  कर  समझ  जरा  पहले  अपने में

बिन   ढूंढ़े   ही   स्वर्ग   दिखे   दिन  में  सपने  में

 

भर   ले   मन   में  भाव  मस्तिष्क  तन  मंतर  में

स्वर्ग   कहीं   ना   और,  बसा  खुद  के  अंतर में

रचनाकार रामबृक्ष बहादुरपुरी

( अम्बेडकरनगर )

यह भी पढ़ें :-

किसानों का दर्द | Kavita Kisano ka Dard

Similar Posts

  • कलम की आवाज | Kavita

    कलम की आवाज ( Kalam ki aawaj ) ( मेरी कलम की आवाज सर्वश्रेष्ठ अभिनेता दिलीप साहब जी को समर्पित करती हूं ) “संघर्षों से जूझता रहा मगर हार न मानी, करता रहा कोशिश मगर जुबां पर कभी न आई दर्द की कहानी”। कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता तो लकड़ी के काटने का…

  • रिद्धि-सिद्धि के दातार | Riddhi-Siddhi ke Datar

    रिद्धि-सिद्धि के दातार ( Riddhi-Siddhi ke datar )    हर कार्य प्रारम्भ करतें बाबा हम लेकर आपका नाम, दीप जलाकर पुष्प चढ़ाकर शुरु करतें अपना काम। भोग लड़वन का लगातें आपके गजानंद सवेरे शाम, बुद्धि कौशल के देवता आपकों कोटि-कोटि प्रणाम।। शादी हो या कोई उद्धघाटन मुंडन अथवा गृह प्रवेश, सिद्धविनायक मंगलमूर्ति शुभम हर-लेते हो…

  • प्रेम पलेगा जब अंतस में | Kavita Prem Palega Jab Antas mein

    प्रेम पलेगा जब अंतस में ( Prem palega jab antas mein )   प्रेम पलेगा जब अंतस में,पीड़ा बारंबार मिलेगी निज स्वार्थ अस्ताचल बिंदु, समता भाव सरित प्रवाह । त्याग समर्पण उरस्थ प्रभा, स्पृहा मिलन दर्शन अथाह । पग पग कंटक शूल चुभन, पर मुखमंडल मुस्कान खिलेगी । प्रेम पलेगा जब अंतस में, पीड़ा बारंबार…

  • हाड़ कपावै थर थर ठण्डी | Thandi

    हाड़ कपावै थर थर ठण्डी   माह दिसम्बर चहुं दिगम्बर छाया कुहरा धरती अम्बर, न आगे न पीछे सूझै काव करी कुछ मन न बूझै ठंडी कै बढ़ि गै प्रकोप बाप रे बप्पा होइ गै लोप भइल रात दिन एक समान कइसे बचै बाप रे जान ठंडी ठंडी बहय बयार बाहर निकलब भय दुस्वार हाड़…

  • सावन महीना | Sawan Mahina par Kavita

    सावन महीना ( Sawan Mahina )    सावन महीना अति विशेष प्रेम ,साधना , पूजा का अशेष ( संपूर्ण ) भक्त करते भक्ति भगवन की निरंतर होता जल अभिषेक।। अनोखी घटा निराली देखो सावन की खुशहाली देखो बदरिया पहने बूंदों के हार अंबर से बरसे प्रेम की फुहार।। रिमझिम रिमझिम सावन माह में कांवरिया जल…

  • तुम मेरे हो | Geet

    तुम मेरे हो ( Tum mere ho )   तुम मेरे हो तुम मेरे हो, सुंदर शाम सवेरे हो। जीवन की बगिया में तुम, खिलते फूल घनेरे हो।   मुस्कानों से मोती झरते, प्रेम उमड़ता सागर सा। महक जाता दिल का कोना, प्रेम भरी इक गागर सा।   मधुबन मन का खिलता जाता, प्रियतम तुम…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *