वालिदैन | Walidain par kavita

वालिदैन

( Walidain ) 

( 2 ) 

वालिदैन के फ़र्ज़ अदा करना बड़ा मुश्किल
वालिदैन के कर्ज़ अदा करना बड़ा मुश्किल

पैदाइश से गुरू नोनहिल अल्हड़ जवानी तक
क़दम दर क़दम अदा करना बड़ा मुश्किल

मां के आंचल पिता के आग़ोश तक
लम्हा दर लम्ह़ा अदा करना बड़ा मुश्किल

गोद टर देता गंदी गिला शिक्वा नहीं
बदल देते लिबास अदा करना बड़ा मुश्किल

ज़रा भूख प्यास दर्द बर्दाश्त नहीं होता
जब बिलख रोता अदा करना बड़ा मुश्किल

ख़ून पसीना एक कर बुलंद बनाया ‘कागा’
एक बूंद का अदा करना बड़ा मुश्कि

कवि साहित्यकार: तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

( 1) 

फूल खिलाई जिस डाली ने,
कभी न तोड़ो वो डाली।
क्या कसूर है मुझे बताओ,
क्यों हुआ बेघर माली?

जो हाथ झुलाया तुमको झूला,
झूला तूने तोड़ दिया।
जो तेरे खातिर सागर में डूबा,
वो मोती तू छोड़ दिया।

जिस नशे में चल रहा है तू,
ये दौर नहीं टिकनेवाला।
जो दुर्दिन झेल रहे वालिदैन,
तुझपे कल आनेवाला।

जीती बाजी हार चुके हैं,
अब बेहद हैं शर्मिन्दा।
साँसें उनकी चल रही हैं,
कौन कहेगा जिन्दा?

एक रोटी के सिवाय उन्होंने,
और क्या तुमसे माँगा?
वो भी तुम्हें गवारा न हुआ,
उन्हें छोड़ तू क्यों भागा?

सीने में तूफान वो भरकर,
सरेआम तब चलते थे।
बाँध पांव में अंगारा वो,
तूफानों से लड़ते थे।

समाज नहीं बख्शेगा तुम्हें,
हर कोई दुत्कारेगा।
उल्टी गंगा जो भी बहाए,
निश्चित धिक्कारा जाएगा।

 

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )
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