यूं ही रखना सदा ख़याल अपना।

यूं ही रखना सदा ख़याल अपना।

दूर जाकर भी ख़ुश जमाल अपना।
यूं ही रखना सदा ख़याल अपना।

जो भी है आपका ही है वल्लाह।
हम को कुछ भी नहीं मलाल अपना।

कुछ तो बतलाओ ऐ तबीब-ए-दिल
ह़ाल कैसे हो अब बह़ाल अपना।

कौन देखेगा माहो-अन्जुम को।
छत पे आ जाए गर हिलाल अपना।

ह़ालत-ए-ह़ाल भूल जाओगे।
हम दिखा दें अगर कमाल अपना।

काम तौबाएं भी नहीं आतीं।
वो दिखाता है जब जलाल अपना।

कुछ न कुछ तो जवाब देते हम।
आप रखते तो कुछ सवाल अपना।

वो ख़फ़ा क्या फ़राज़ हो बैठे।
जीना-मरना हुआ मुह़ाल अपना।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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