Poem abhimaan

अभिमान | Poem abhimaan

अभिमान

( Abhimaan )

 

किस बात का गुरूर है क्यों है मगरूर तू
क्या तूने कर दिया क्यों है नशे में चूर तू

 

गर्व ही करना तो कर ले वतन की शान पे
बोल मीठे बोल प्यारे धरती पर इंसान से

 

होकर नशे में चूर तू मत करना अभिमान
चंद सांसों का खेल सारा जाना शमशान

 

हम केवल कठपुतली बाजीगर कोई और है
प्यार के मोती लुटाता जा बना जगत में शान

 

?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :- 

मैंने अपने होंठ बंद कर लिए | Ramakant poetry

Similar Posts

  • कर्मफल

    कर्मफल *** कर्मफल के आधार पर ही- लेता प्राणी मानव योनि में जन्म, बड़े खुशनसीब हैं हम । पांच बरस बचपन का बीते, छह से चौदह किशोरवय हो जीते। पंद्रह से उन्नीस चढ़े जीवन की तरूणाई, फिर तो बोझ जीवन बोझ बन बोझिल हुई जाई; गृहस्थी का भार जो दबे पांव है चली आई। पहले…

  • सपनों के लिये | Sapno ke liye | Kavita

    सपनों के लिये ( Sapno ke liye )   हम अपने हर सपनों को सच कर सकते हैं,  चाहे वो चांद पर जाना हो या हो कोई और लक्ष्य  बस इच्छा हो, सनक हो एक जुनून मन में हो,  एक चाहत हो, जो कभी कम न हो। सपनों को सच करने के लिए इस पर…

  • जानकी अनुपमा | Janki Anupma

    जानकी अनुपमा ( Janki Anupma )    जानकी अनुपमा,राम वैभव आधार जनक दुलारी महिमा अद्भुत, प्रातः वंदनीय शुभकारी । राम रमाकर रोम रोम, पतिव्रता दिव्य अवतारी । शीर्ष आस्था सनातन धर्म, सुरभि संस्कृति परंपरा संस्कार । जानकी अनुपमा,राम वैभव आधार ।। मृदु विमल अर्धांगिनी छवि, प्रति पल रूप परछाया । प्रासाद सह वनवास काल, अगाथ…

  • अलविदा महानगर चेन्नई | Kavita Alvida Mahanagar Chennai

    अलविदा महानगर चेन्नई ( Alvida mahanagar chennai )   हम आज तक थें महानगर चैन्नई, आज अलविदा हम कहतें है भाई। मिले सबकी शुभ कामनाएँ बधाई, चलते है अन्ना अब कर दो विदाई।। मुस्कराते ही रहना चाहें कैसा भी हो पल, खुशियाँ लेकर आए ये आनें वाला कल। जीवन के इस सफर में स्नेह मिलता…

  • उत्सव आज मनाया है | Poem utsav aaj manaya hai

    उत्सव आज मनाया है ( Utsav aaj manaya hai )   जिन भावों को मन में धर कर, उत्सव आज मनाया है। जिन भावों को राष्ट्रगान में, मिलकर हमने गाया है।।   जिन भावों से भारत माँ की, जय जयकार लगाई है जिन भावों से अमर शहीदों को माला पहनाई है   एक निवेदन उन…

  • कुर्सी पर हक | Poem kursi par haq

    कुर्सी पर हक ( Kursi par haq )   दिल जिगर को तोल रहे, खुद को बाजीगर कहते। जनभावों संग खेल रहे हैं, मन में खोट पार्ले रहते।   वादों प्रलोभन में उलझा, खुद उल्लू सीधा करते। भ्रमित रहती जनता सारी, वो अपनी जेबें भरते।   कलाकार कलाबाजीयां, जादूगरी जिनको आती। नतमस्तक सारी दुनिया, उनकी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *