Bhay

भय | Bhay

भय

( Bhay )

 

उथले पानी में तैरे
तैरे फिर भी डर कर तैरे
पास पड़ी रेत मिली
पैरों के धूमिल चिन्ह मिले
लहर पानी की जो आई
उन चिन्हों को मिटा गई
भय के मोहपास के कारण
मोती की आशा मिलने की
खाली मेरे हाथ रहे
कुएं में रहने वाला मेंढक
खुद को ज्ञानी समझे है
पाला पड़ा समंदर से
चक्षु ज्ञान के हैं खुले
आत्मग्लानि को त्याग वही
अंतर्मन की पीड़ा हरने
उत्साह उमंग भरा होता
कूदी होती गर गहरे में
मोती में चुन पाती खुद से
जीवन सार्थक किया होता

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

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