मेरे हिस्से का प्रेम

मेरे हिस्से का प्रेम

मेरे हिस्से का प्रेम

मैं तुम से
दूर हूँ
धूप और छाँव की तरह
पुष्प और सुगंध की तरह
धरा और नील गगन की तरह
दिवस और निशा की तरह
जनवरी और दिसम्बर की तरह
साथ-साथ होते हुए भी
बहुत दूर- बहुत दूर

परन्तु
प्रति दिन मिलता हूँ
तुम से
तुम्हारी नयी कविता के रूप में
नये शब्दों के रूप में

जीवन में
कभी कोई सुयोग बना..तो
मैं तुम से मिल कर
कभी रोना – कभी हँसना चाहूँगा
अनजान राहों पर चलना चाहूँगा
जीवन गुज़र रहा है
अनुकूलता में
प्रतिकूलता में
आभाव में
बिखराव में
मन सुरभित है
मधुर स्मृतियों से
अब मेरे पास
इस के अतिरिक्त
कुछ भी नहीं है
प्रेम जीवन में
सर्वस्व
ले कर आता है
इस लिए
यदि हो सके तो
एक काम करना

तुम
मेरे हिस्से का
प्रेम बचा कर रखना…।

Dr Jaspreet Kaur Falak

 डॉ जसप्रीत कौर फ़लक
( लुधियाना )

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