मानवीय संवेदना ख़त्म हो गई! हे ईश्वर ! आज तेरे मनुष्यों में,दयाभाव एवं मनुष्यता न रही।एक दूसरे के प्रति इन मनुष्यों में,बस! घृणा व शत्रुता समा रही है।मानवीय संवेदना ख़त्म हो गई!हैवानियत, हिंसा खूब बढ़ रही है।पति पत्नी की हत्या कर रहा है।आजकल मनुष्य पशु समान है।चंद पैसे हेतु हत्याएँ भी होती हैं।आज मनुष्य का,…