आग | Aag
आग ( Aag ) शाम को अभी और ढल जाने दो जरा बर्फ को अभी और पिघल जाने दो जरा अभी अभी ही तो ली है अंगड़ाई तुमने दिल को अभी और मिल जाने दो जरा अभी अभी ही तो मुस्कराए हैं लब तेरे अभी अभी ही तो शरमाई हैं आंखें तेरी अभी अभी…
जागते रहो ( Jagte raho ) ये जागने के दिन हैं जागते रहो… दिन रात भागते रहो ठहरो न पल भर के लिए भी क्या पता उस पल ही कोई कर जाए छल संग तेरे डाल दे डेरा अपना घर तेरे! देख रहे हो देश दुनिया में क्या क्या हो रहा है? मनुज बन…
गंगा मइया ( Ganga maiya ) गंगा मइया कै निर्मल लहरिया, नहाये चला काशी शहरिया। राजा भगीरथ ने गंगा को लाया, रोज -रोज करती पावन वो काया। छोड़ा ई रोज कै बजरिया, नहाये चला काशी शहरिया, गंगा मइया कै निर्मल लहरिया, नहाये चला काशी शहरिया। शिव की जटा से निकली है गंगा, धो करके…
साईबर ठगों का आतंक ( Cyber thagon ka aatank ) आज बढ़ रहा है तीव्रता से साईबर ठगों का आतंक, अपने-आपको समझ रहें है वह सभी से बड़े दबंग। फैला रहें है जो जाल धनाधन ऐसे अनेकों है शैतान, जाल झूठ छल-कपट हेरा फेरी से कर देते है दंग।। करते है मोबाइल सिम बदलकर…
संविधान का निर्माता ( Samvidhan ka nirmata ) ख़ुदा का नूर बनकर आया वह संविधान का निर्माता, सबको समान अधिकार मिले जिनका ये अरमां था। चुप-चाप गरल पीता रहा पर दिलाकर रहा समानता, ख़ुद पढ़ो फिर सबको-पढ़ाओ ऐसा जो कहता था।। तुम आज झुक जाओ कागज की पुस्तकों के सामने, फिर कल को देखना…
नोचे वही वरक़ ( Noche wahi varak ) बाक़ी हुरूफ़ जो ये मेरी दास्तां के हैं अहसान यह भी मुझ पे किसी मेहरबां के हैं रह रह के बिजलियों को है इनकी ही जुस्तजू तिनके बहुत हसीन मेरे आशियां के हैं क़ुर्बानियाँ शहीदों की भूले हुए हैं लोग गुमनाम आज नाम उन्हीं पासबां के…
इश्क़ का कर्जा ! ( Ishq ka karz ) अपनी लौ से तपाए ये कम तो नहीं, आए गाहे – बगाहे ये कम तो नहीं। सुर्ख होंठों से मिलता रहे वो सुकूँ, दूर से ही पिलाए ये कम तो नहीं। मेरे तलवों से कितने बहे हैं लहू, आ के मरहम लगाए ये कम तो…
अभाव ( Abhaav ) अंधेरा न होता तो सवेरा न होता होता न दिन तो रात भी न होती यही तो है सच्चाई भी जीवन की होता सबकुछ तो कुछ भी न होता.. न होती किसी को जरूरत किसी की न किसी को किसी की पहचान होती न होती भूख किसी को न प्यास…
दिल में शोले उठे हैं यहां ( Dil mein shole uthe hai yahan ) इश्क में लुट चुके है यहां दिल में शोले उठे हैं यहां घेर ली है ज़मीं कांटों ने फूल कब खिल सके हैं यहां सब फरेबी निकलते हैं लोग सोच से सब परे हैं यहां दौलतें शोहरतें देखकर लोग इज़्ज़त…