Basant ritu par Kavita

बसंत ऋतु के आगमन पर | Basant Ritu par Kavita

बसंत ऋतु के आगमन पर

( Basant ritu ke aagman par )

 

मदिर से है बसंत, आये हैं जी पाहुने से
सखि पिया बिन मोहे, कछु न सुहावत है।।

खखरा के पात उड़, उड़ आये द्वारे आज
पवन के झौकन भी, जिया को जगावत है।।

अमुआ के बौर वाली, वास है सुवास आली
महुआ मदन के तो, मान को बढ़ावत है।।

कूक रही काकपाली, हँस रही हरयाली
उठ भुनसारे तोहे, ‘चंचल’ बुलावत है।।

 

कवि भोले प्रसाद नेमा “चंचल”
हर्रई,  छिंदवाड़ा
( मध्य प्रदेश )

 

यह भी पढ़ें :-

देश हमारा हम हैं इसके | Kavita Desh Hamara

 

Similar Posts

  • स्वामी- विवेकानंद | Swami Vivekananda Par kavita

    स्वामी- विवेकानंद ( Swami Vivekananda ) ( 3 )  कोलकाता के कुलीन कयस्थ परिवार में पुत्र उत्पन्न हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त,माता भुनेश्वरी देवी जग में महान थी, जिसके घर में स्वयं विश्व धर्म मार्गदर्शन गुरू प्रकट हुआ।। देशभक्त सन्यासी बनकर मातृभूमि का नमन करू जो, सारे जीवों में स्वयं परमात्मा का अस्तित्व है वंदन करे…

  • चमत्कारी करणी माता | Karni Mata

    चमत्कारी करणी माता ( Chamatkari karni mata )    जगत जननी जगदम्बे का अवतार जिसे कहा जाता, देवी-हिंगलाज के अवतार रुप में जिन्हें पूजा जाता। समाज के सारे वर्गों में इनकी मान्यता बताया जाता, करणी जी महाराज के रूप में इनको जाना जाता‌।। बीकानेर के राठौड़ राजवंश की आराध्य कहां जाता, जिसका स्थापना-विस्तार में माॅं…

  • आकर्षण है पाप में | Akarshan hai Pap Mein

    आकर्षण है पाप में ( Akarshan hai pap mein )   जीवन की सुख-शान्ति, दग्ध हो जाये न अनुताप में। सदा सजग होकर रहना है, आकर्षण है पाप में। कुत्सित छलनायें आती हैं, कृत्रिम रूप संवार कर। सहज नहीं स्थिर रह पाना, मन को उन्हें निहार कर। एक-एक पग का महत्व है, पथिक सशंकित रहना!…

  • बहादुर चिड़िया | Bacchon ki kavita

    बहादुर चिड़िया ( Bahadur chidiya )      एक बार लगी जंगल मे आग, भाग गये पशु-पक्षी और बाघ। बैठी थी अकेंली चिड़िया उस पेड़, छोड़कर नही जा रहीं थी वह पेड़।।   चिल्ला रहा था आग-आग बंदर, बोला छोड़कर चलो अब जंगल। बोली चिड़िया नही चलूंगी में आज, में तो रहूंगी यही इस पेड़…

  • आग | Aag

    आग ( Aag )    शाम को अभी और ढल जाने दो जरा बर्फ को अभी और पिघल जाने दो जरा अभी अभी ही तो ली है अंगड़ाई तुमने दिल को अभी और मिल जाने दो जरा अभी अभी ही तो मुस्कराए हैं लब तेरे अभी अभी ही तो शरमाई हैं आंखें तेरी अभी अभी…

  • कस्तूरी गंध | Kavita Kasturi Gandh

    कस्तूरी गंध ( Kasturi Gandh ) तुमको क्या मालूम कि, कितना प्यार किया करती हूं। ठोकर खाकर संभल-संभल,कर सदा बढ़ा करती हूं।‌। रुसवा ना हो जाए मोहब्बत की ये, दुनियां हमारी। मिले उमर लंबी इसको ये, दुआ किया करती हूं।। आशाओं के दीप जलाएं ,हृदय अंधेरी कुटिया। बाती बन में जली प्रियतम, सदा तुम्हारी सुधियां।।…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *