कविताएँ

  • मृत्युबोध | Mrityu Bodh par Kavita

    मृत्युबोध ( Mrityu Bodh )   कुछ धुंवा से द्वंद मंडराने लगे हैं। मृत्यु तत्व महत्व समझाने लगे हैं।। ऐषणाओं से सने, जीवन से मुक्ति, बन मुमुक्षु अन्यथा, है मृत्यु युक्ति,। अनसुनी सी बात बतलाने लगे हैं।। मृत्यु तत्व० जीवन है आशा, निराशा मृत्यु ही है, सिंधु में रहता है प्यासा, मृत्यु ही है। युद्ध…

  • शान तिरंगे की | Tiranga par kavita

    शान तिरंगे की ( Shaan tiranga ki )     सबसे ऊंची आज जगत् में शान तिरंगे की । वर्षों बाद लौटी है पहचान तिरंगे की।।   अब बीच खङी ये नफ़रत की दीवार गिरने दो। अमन पैग़ाम है इसका समझो जुबान तिरंगे की।।   तलवारें वहशत की लेकर ना काटो डोर उलफत की। सलामत…

  • 15 अगस्त (कविता) | Hindi poem 15 August

    15 अगस्त (कविता) ( Poem 15 August )   आज 15 अगस्त है। उत्साह जबरदस्त है।।   आओ यशोगान करें ऊंची इसकी शान करें। देशप्रेम पर कुछ कहने का आज सही वक्त है।।   गौरवशाली देश हमारा शहीदों की आंखों का तारा। श्रवण रामचंद्रजी जैसे कहां पितृभक्त है!   दो  पलकों में दुनिया डोली स्वर्ग-नरक …

  • संसार | Sansar par Kavita

    संसार ( Sansar )  ईश्वर तेरे संसार का बदल रहा है रूप-रंग, देख सब हैं चकित और दंग। क्षीण हो रहा है वनों का आकार, जीवों में भी दिख रहा बदला व्यवहार। कुछ लुप्त भी हो रहे हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। वायु हुआ है दूषित, विषैले गैसों की मात्रा बढ़ी है अनुचित। समझ नहीं…

  • मां

    मां   मां एक अनबूझ पहेली है, मां सबकी सच्ची सहेली है, परिवार में रहती अकेली है, गृहस्थी का गुरुतर भार ले ली है। ऐ मां पहले बेटी,फिर धर्मपत्नी, बाद में मां कहलाती हो। पहली पाठशाला,पहली सेविका तूं घर की मालकिन कहलाती हो।। बुआ,बहन,मामी,मौसी कहलाये, माता,दादी,नानी नाम बुलवाये, परिवार की जन्म दात्री नाम सुहाये, अबला,सबला,…

  • स्वर्ग-नर्क | Poem in Hindi on Swarg narak

    स्वर्ग- नर्क ( Swarg – Narak )   स्वर्ग है या नर्क है कुछ और है ये। तूं बाहर मत देख तेरे ठौर है ये।। तेरे मन की हो गयी तो स्वर्ग है। मन से भी ऊपर गया अपवर्ग है। आत्मतत्व संघत्व का सिरमौर है ये।। तूं बाहर० मन की अभिलाषा बची तो नर्क है।…

  • ग़र ना होती मातृभाषा | Matribhasha Diwas Par Kavita

    ग़र ना होती मातृभाषा ( Gar na hoti matribhasha )      सोचो    सब-कुछ    कैसा  होता, ग़र     ना     होती   मातृभाषा ।।   सब     अज्ञानी    होकर    जीते जग-जीवन     का   बौझा  ढोते, किसी  विषय  को   पढ पाने की कैसे   पूरी    होती  अभिलाषा।।   कैसे    अपना     ग़म    बतलाते कैसे    गीत     खुशी    के   गाते, दिल  की  दिल  में ही …

  • भिखारी | Hindi Poem on Bhikhari

    भिखारी ( Bhikhari )    फटे पुराने कपड़ों में मारे मारे फिरते हैं भिखारी, इस गांव से उस गांव तक इस शहर से उस शहर तक न जाने कहां कहां ? फिरते हैं भिखारी । अपनी भूख मिटाने/गृहस्थी चलाने को न जाने क्या क्या करते हैं भिखारी? हम दो चार पैसे दे- अनमने ढंग से…

  • हिन्दी मे कुछ बात है | Short Poem on Hindi Diwas

    हिन्दी मे कुछ बात है ( Hindi me kuch baat hai )    हिन्दी दिवस पर विशेष  (कविता)  हिन्दी अपनी मातृभाषा, हिन्दी में कुछ बात है! हिन्दी बनी राष्ट्र भाषा, भारत देश महान में। ‘नेताजी’ ” के हिन्दी नारे, गूंजे हिंदुस्तान में। ‘गुप्त’ सरीखे राष्ट्र-कवि, ‘तुलसी’ जैसे महाकवि। जाने कितने अमर हो गए, लिखकर इसी…

  • पीर हमरे करेजवा में आवल करी | Bhojpuri Kavita in Hindi

    पीर हमरे करेजवा में आवल करी (भोजपुरी-इलाहाबादी) गीत जब केउ सनेहिया क गावल करी। पीर हमरे करेजवा में आवल करी।। माया क जहान प्रेम सत्य क निशनवां, प्रेम की दीप जलै निशि दिनवा दिल में रहिके दिल काहे दुखावल करी।। पीर हमरे करेजवा…. राधाकृष्ण हीर रांझा प्रेम की मुरतिया, मीरा क प्रेम प्याला सुनि फटइ…